Saturday, April 3, 2010

पुरुष हूँ , ना समझो पत्थर दिल .......>>> संजय कुमार

अरे तुम तो पत्थर दिल हो , तुम सारे पुरुष एक जैसे होते हो , तुम्हारे अन्दर तो संवेदना नाम की चीज बिलकुल भी नहीं है , मैंने तो कभी तुम्हारी आँख मैं एक आंसू तक नहीं देखा ! इससे पता चलता है की तुम सारे मर्द एक जैसे होते हो ! तुम्हारी आँखों मैं प्यार तो मुझे कभी दिखता ही नहीं ! पत्थर दिल कहीं के ! जब इस तरह की बातें एक पुरुष को बोलीं जाती हैं , तो सोचिये क्या गुजरती है उसके दिल पर ! कितने आंसू वह मन ही मन रोता है ! शायद ये कोई नहीं जनता ! बस कह दिया की पुरुष पत्थर दिल होता है !
इन्सान भावनाओं का पुतला होता है , बहुत सारी अभिवयक्तियाँइन्सान भावनाओं के द्वारा ही हमको बताता है , यहाँ हम पुरुष भावनाओं की बात कर रहे हैं ! जहाँ हमने अपने समाज मैं देखा है कि हमें लड़कियों का ठहाका लगाकर हँसना आज भी हर जगह पसंद नहीं किया जाता ! ठीक उसी प्रकार पुरुषों का रोना आज कमजोरी की निशानी माना जाता है !क्या ये सही है ! क्या पुरुषों का रोना सिर्फ कमजोरी की निशानी है ! जी नहीं पुरुष कमजोर नहीं होता ! पुरुष एक इन्सान है , और उसके अन्दर भी संवेदनाएं होती हैं !
आज पुरुष अपने जीवन मैं कितनी चीजों से लड़ता है, यह सब हम लोग जानते हैं ! पर हर बात पर पुरुष नहीं रोता उसके अंदर सब्र का पैमाना बहुत बड़ा होता है , वो महिलाओं कि तरह वयव्हारनहीं करता ! हमारे देश मैं एक बड़ा भाग महिलाओं का, सिर्फ घर कि चाहर दिवारी और चौका बर्तन मैं ही व्यतीत करती हैं ! इसलिए उन्हें इस बात का मालूम नहीं होता कि वाहर काम करने बाले पुरुष किन किन समस्यायों का सामना करते हैं ! आज का पुरुष सिर्फ पिस के रह जाता है ! आज के वातावरण मैं !
आज पुरुष के पास कितनी समस्याएँ है ! यह भी हमें जानना होगा ! एक परिवार मैं एक पुरुष कि स्थित्ति ! माँ बाप को लगता है, कि शादी के बाद उनका बेटा उनसे दूर हो गया ! बहिन को लगता है , कि शायद अब हमे भाई का प्यार नहीं मिलेगा ! वहीँ पत्नी चाहती है कि उसका पति सिर्फ उसका होकर रहे ! इस तरह का माहोल हमने अपने आस पास जरूर देखा होगा ! उस स्थिति मैं उस पुरुष कि क्या दशा होती होगी ! इसका अंदाजा लगाना मुस्किल है !
मैं यहाँ सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ ! कि अगर पुरुष नहीं रोता या उसकी आँख मैं आंसू नहीं आता तो इसका यह अंदाजा बिलकुल भी नहीं लगाना चाहिए कि वो इन्सान नहीं पत्थर है ! वह भी महिलाओं कि तरह एक इन्सान है !अगर इन्सान नहीं होता तो! क्या एक पिता का अपनी बेटी कि विदाई पर रोना कमजोरी कि निशानी माना जायेगा ! नहीं यह अभिव्यक्तियाँ हैं जो कभी भी और किसी भी तरह एक पुरुष व्यक्त करता है !

इसलिए कहता हूँ कि मैं भी एक इन्सान हूँ ! एक पुरुष हूँ कोई पत्थर नहीं !


धन्यवाद

5 comments:

  1. एक पुरुष हूँ कोई पत्थर नहीं .nice

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  2. nice
    !अगर इन्सान नहीं होता तो! क्या एक पिता का अपनी बेटी कि विदाई पर रोना कमजोरी कि निशानी माना जायेगा ! नहीं यह अभिव्यक्तियाँ हैं जो कभी भी और किसी भी तरह एक पुरुष व्यक्त करता है !
    yahi to wo bat he


    http://kavyawani.blogspot.com/


    shekhar kumawat

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  3. अच्छी प्रस्तुति.....विचारणीय पोस्ट....

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  4. संवेदनशील प्रस्तुति......
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  5. Sach hai samvedansheelta par kisi ek vishesh gender ka ekadhikaar nahin.. lekin hua kya???

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