Friday, April 23, 2010

ना रखें अपनी ही मौत का सामान अपने ही घर मैं .......>>>> संजय कुमार

कहते हैं अस्त्र -शस्त्र वीरों और योद्धाओं का आभूषण होता है ! जिसे वीर अपनी रक्षा और दुश्मनों को मारने के लिए अपने पास रखते हैं ! अब ना तो वीर वचे हैं, और ना ही योद्धा! पर अस्त्र शस्त्र अब भी जीवित हैं ! पर जैसे जैसे समय गुजरता गया अस्त्र शस्त्र की परिभाषा भी बदल गयी है ! आज अस्त्र -शास्त्र बन गए हैं हथियार ! ऐसे जो ले रहे हैं अपनों की जान ! अब इन्सान अस्त्र शस्त्र सिर्फ शौक के लिए रखने लगा है ! आज हथियार रखना एक अच्छे रुतबे की निशानी माना जाता है ! बहुत से व्यक्ति अपने पास हथियार रखते हैं! इस शौक के चक्कर मैं कुछ इन्सान अपने घर मैं अपनी मौत का सामान ले आते हैं ! शायद इन्सान इन हथियारों का उपयोग कभी दुश्मन पर ना कर पाए , उसका गलत जगह उपयोग जरूर करते हैं !उपयोग करता है तो झूंठी शान के चक्कर मैं ,कभी किसी कि शादी पार्टी मैं या बच्चे के जन्म पर इन हथियारों का खूब प्रदर्शन करते हैं ! और करते हैं ऐसी गलती जिसके लिए उन्हें जीवन भर पछताना पड़ता है ! जब इनके द्वारा इन हथियारों का झूंठा प्रदर्शन किया जाता है , ऐसी ही किसी जगह , जिसका खामियाजा भुगतना पड़ता हैं ! किसी निर्दोष और मासूम को ! पर यह अस्त्र शस्त्र रखने बाले यह नहीं जानते, कि कब यह हथियार जो हम अपनी सुरक्षा के लिए रख रहे हैं ! वही हथियार हमारी गलती से किसी मासूम की जान तक ले लेती है ! कभी कभी यह हथियार अपनों पर भी चला देते हैं ! पर आज कल घटनाएं बढती जा रही हैं !सभी हथियार रखने बाले ऐसा नहीं करते ! पर आजकल ऐसा हो रहा है! जोश मैं होश खो रहे हैं !
हम सभी , रोज अख़बार पड़ते हैं , रोज टी व्ही देखते हैं , रोज यह खबर सुनते हैं कि , किसी व्यक्ति ने अपनी ही पिस्तोल से अपने माँ-बाप कि हत्या करदी , या अपने बच्चे को , या अपनी पत्नि को या , जिस पिता ने जन्म दिया उसी को अपने घर मैं रखी हुई बन्दूक से गोली मार दी ! या गुस्से मैं खुद को गोली मार ली ! क्यों हो रहा है यह सब ! यह मैं पहले ही कह चूका हूँ कि आज के इन्सान के पास सब्र बिलकुल भी नहीं हैं ! और जब इन्सान का सब्र टूटता है तो , वह इस तरह कि घटनाओं को अंजाम देता है ! इन्सान का गुस्सा आज इतना ख़राब हो गया है ! की वह कब इन हथियारों का प्रयोग अपनों पर करदे नहीं कह सकते ! यह हमेशा देखा गया है , की इन्सान जब अपने पास हथियार रखने लगता हैं ,तो वह अपने आप को जरूरत से ज्यादा ताकतवर समझने लगता है ! आज इस आधुनिक दुनिया मैं छोटे छोटे बच्चे बहुत होशियार हो गए हैं ! बस टी व्ही पर फिल्म देखी और तैयार हो गए चोर पुलिस का खेल खेलने ! और उठा ली घर मैं ही रखी पिस्तोल ! और हो गया एक और हादसा ! आज घर मैं रखा हथियार दुश्मनों को कम अपनों को ज्यादा मार रहा है ! और ले रहा है ! अपनों की जान ! और इन्सान कभी कभी ले लेता अपनी खुद की जान !


गुजारिश है उन सभी लोगों से जो हथियार अपने घर मैं रखते हैं ! इनको दूर रखें अपने बच्चों की पहुँच से ! दूर रखें अपने गुस्से से ! और गुजारिश है उन सभी से जो रखते हैं सिर्फ शौक और झूंठी शान के लिए .................
ना रखें अपनी ही मौत का सामान अपने ही घर मैं .....................................................

धन्यवाद

8 comments:

  1. हमारे पुरखे किसी जागीर में पुरोहित का सम्मान पाते थे। इतना कि एक बार जब मैं वहाँ था तो सवाल पूछने पर छोटे दादा जी ने कहा था ठाकुर साहब हों या कोई और आगे से किसी को नमस्ते ना करना। हम यहाँ के पुरोहित हैं विपन्न और सब के पूज्य। यदि एक बार जागीरदार के बच्चे को भी नमस्ते कर लिया तो ये गांव में मेरा जीना मुश्किल कर देंगे।
    बरसों बाद जागीरदार साहब मेरे पड़ौस के मकान में पधारे। बगल के बरांडे मे महफिल लगी थी। मैं अपने बरांडे मे निकला तो उन्हें देख कर अनदेखा किया, कहीं दादाजी की बात का उल्लंघन ना हो जाए। तो जागीरदार ने ही आवाज दी। वकील साहब! कैसे हैं? अरे! हमारी बंदूकें सरकार जब्त कर रही है, तीन से अधिक नहीं रख सकते। एक आध आप ले लो।
    मैं ने उन्हें कहा -बंदूकें हमारा हथियार नहीं, हमारा हथियार तो कलम है सो हम हरदम जेब में रखते हैं। बंदूक ले लेंगे तो सजावटी बनी रहेगी और किसी दिन उसे कोई और ही हमारे सीने पर तान देगा।

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  2. सोच के धरातल पर जो सामंती है उनके लिये तो यह आम बात है.

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  3. achi jaankari ke sath sunder lekh sanjay bhai

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  4. waqt rahte chet jaayen to achchha hai warna baad me duniya yahi kahegi ki- 'ab pachhtaaye hot ka jab chidiya chug gayee khet'

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  5. हथियारों कि समस्या तो इन देशों में भी है...लोग शिकार का शौक रखते हैं...और बन्दूक तमंचा धड़ल्ले से बिकते हैं पान कि दुकानों में....
    तभी तो इतने हादसे होते हैं....अक्सर सुनते हैं कि बच्चे ने स्कूल में गोली चलाई...या फिर कोई कर्मचारी नौकरी से निकाले जाने पर इतना नाराज़ हुआ कि छोट कर गोली चला आया ऑफिस में...
    आपकी फ़िक्र जायज़ है...
    बहुत ही सार्थक प्रविष्ठी...
    धन्यवाद...

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  6. अच्छे विषय पर लिखा आपने.. आपकी सोच का सम्मान करता हूँ, लोगों को हथियारों के प्रदर्शन से क्या ख़ुशी मिलती है समझ से बाहर है.

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