Wednesday, May 15, 2013

टूटी हुई माला को अब जोड़ना होगा .....( परिवार -दिवस ) .......>>>> संजय कुमार

एक - एक मोती चुनकर , एक ही धागे में कई मोतियों को पिरोकर बनाई जाती है माला ! माला फूलों की होती है ! हीरे - जवाहरात , नग , सोने - चाँदी और भी कई प्रकार की होती है ! जब माला किसी के गले में पहनाई जाती है तो पहनने वाले का महत्त्व और भी ज्यादा बड़ जाता है ! सच तो ये है कि , माला उन्हीं के गले में डाली जाती है जो उसके असली हक़दार होते हैं ! खैर ये तो मालाओं की व्याख्या है ! किन्तु  मैं जिस माला की बात कर रहा हूँ उसका तात्पर्य हम सभी से है और वो मोतियों की माला हमारा संयुक्त परिवार है ! एक माला जिस तरह अपने में सभी मोतियों को पिरोकर रखती है ठीक उसी प्रकार एक संयुक्त परिवार अपने परिवार के सभी सदस्यों को एक माला के रूप में  बाँध कर रखता है ! एक मजबूत माला वही होती है जिसका धागा मजबूत होता है अर्थात माला रुपी परिवार के सभी सदस्य जिनके अन्दर संस्कार , अपनापन , एक-दुसरे के प्रति प्रेम का भाव आदि होते हैं , और ये सब कुछ एक संयुक्त परिवार में ही हो सकता है ! क्योंकि हम एक संयुक्त परिवार में रहकर ही नियंत्रित होते हैं ! एकल परिवार प्रणाली में हमारे ऊपर नियंत्रण का आभाव होता है जिससे कई समस्याएं हमारे सामने उत्पन्न होती रहती हैं ! सभी सदस्यों का आपस में एक - दुसरे के प्रति मान- सम्मान , आदर , संस्कार , एक -दुसरे के प्रति प्रेम का भाव और अपनापन जहाँ ये सभी चीजें एक साथ उपस्थित होती हैं, तो उस जगह को हम एक परिवार कहते हैं , हँसता -खेलता परिवार ! आज के दूषित माहौल में समाज का सर्वश्रेष्ठ परिवार ! सच तो ये है हमारी एकता में जो शक्ति है वो शायद किसी अकेले इंसान में नहीं है ! अकेला इंसान आज के समय में कुछ भी नहीं है और  यह बात बिलकुल सही है ! क्योंकि हम जानते हैं  एकता और संगठन की शक्ति को ! जब हम संगठन की ताकत से भली-भांति परिचित हैं तो फिर क्यों हमारा पारिवारिक संगठन टूट रहा है ! आज के आधुनिक युग ने हमें भले ही बहुत कुछ दिया हो फिर भी हमने आधुनिक बनने की होड़ में बहुत कुछ खोया है ! आप भी इस बात से सहमत होंगे ......

एक समय था जब हम किसी के घर जाते थे तो वहां पर हमारी मुलाकात परिवार के सभी सदस्यों से होती थी तो मन को एक अनूठी सी ख़ुशी मिलती थी मन प्रसन्न हो जाता था ! घर में दादाजी -दादीजी, माता -पिता , चाचा-चाची, भैया-भाभी, और भी कई रिश्ते जिनसे एक घर सम्पूर्ण परिवार बनता है ! ( आज मुमकिन नहीं लगता आज हमारे पास घर हैं किन्तु परिवार नहीं ) पर जैसे जैसे समय बीत रहा है ! जब से इन्सान अपने आप से मतलब रखने लगा है  सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है जबसे उसने परिवार के बारे में सोचना छोड़ दिया है तब ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्यों का एक - दुसरे के प्रति अपनेपन का भाव खत्म होने लगता है और शुरुआत हो जाती है एक संयुक्त परिवार रुपी माला के टूटने की ! जब अपनापन खत्म होता है तो पारिवारिक एकता में  विघटन और वदलाव होने लगता है ! कारण एक -दो नहीं कई हैं और सबसे बड़ा कारण हमारा अपने ऊपर नियंत्रण का ना होना , सब्र की कमी , बात - बात पर अपना आपा खो देना जिस कारण से आये दिन घर- परिवार में लड़ाई - झगडे की स्थिति बनी रहती है ! आये दिन होने वाले इन्हीं झगड़ों के कारण अपनों से अपने परिवार से दूर हो रहा है ! इन्हीं बातों को लेकर परिवारों के बीच दीवार खींच जाती है ! ऐसी स्थिति में एक बड़ा सा परिवार बदल जाता है चिड़ियों के घोंसलों जैसा और  जब एक बार अपनों के बीच दीवार खिंच जाती है तो फिर हमारा परिवार , परिवार नहीं कहलाता  ईंटों की चार दीवारी से बना घर कहलाता है और बन जाता है ईंट पत्थर से निर्मित एक मकान ! आज इस विघटन और वदलाव से हमारा कितना अहित हो रहा है , शायद हम ये बात बहुत अच्छे से जानते है  लेकिन जानकर भी अनजान हैं ! इसका असर आज हम देख रहे हैं सुन रहे हैं ! अपने बच्चों से दूर होते संस्कार के रूप में , दूर होती रिश्तों की महक , खत्म होती अपनत्व की भावना और प्रेम , एक-दुसरे का मान-सम्मान करने का भाव और  ये सब कुछ हो रहा है परिवार के बंटने से ! जब से हम वदले तब से वदल गयी हमारे घर- परिवार की कहानी  और ये कहानी आज की है ! आज ये कहानी " घर - घर की कहानी " है !
हम सभी को ईंट - पत्थर से बने मकानों से निकलकर अपने घर - परिवार में वापस आना होगा या फिर हमें फिर से अपने परिवार जो जोड़कर एक सम्पूर्ण परिवार बनाना होगा ! यदि हमारे अन्दर परिवार के किसी सदस्य के प्रति मन में नाराजगी है तो आपस में बैठकर उसे दूर करना होगी अन्यथा ये परिवार विघटन रुपी खाई और गहरी ...... गहरी होती जाएगी ........ क्या हम इस पर विचार कर सकते हैं ......? क्या हम आगे बढ़कर टूटे हुए परिवार को जोड़ सकते हैं ! अब हमें पुनः माला  में मोती पिरोकर  टूटी हुई माला को जोड़ना होगा 

धन्यवाद

Sunday, May 12, 2013

तलाश जारी है ...( मदर्स - डे Mother's Day ) ........>>> गार्गी की कलम से

आपकी हर वेदना
मेरी संवेदना हो गई 
आपकी जिंदगी 
मेरे लिए सबक हो गई 
कौन कहता है कि ,
" खुशियाँ "
आती जाती रहती हैं 
आपके करीब थे जब तक 
सुकून ना खोया था 
दूर होकर आपसे 
खुशियाँ भी ना सुकून हो गई 
पा कर भी जिंदगी का 
हर एक सुख 
लगता है कभी - कभी 
जैसे सब कुछ खो दिया है !
मेरे जीवन में 
निःस्वार्थ प्रेम और 
विश्वास की परिभाषा 
आप हो मेरे लिए 
आपको हर किसी में 
खोजती हूँ 
तलाश जारी है अभी , ............ " माँ "

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से ) 

धन्यवाद   

Friday, April 26, 2013

गरीबी का जहर और बाल श्रम .......>>> गार्गी की कलम से

मैंने अपने बेटे को देखा 
प्लेटफ़ॉर्म पर हाँथ फैलाते हुए 
ढावों पर चाय - पानी देते हुए 
गलियों में कचरा बीनते हुए 
खाने - पीने की चीजें चोरी करने पर 
पब्लिक से मार खाते हुए ........
यूँ तो मेरा  बेटा 
अच्छे स्कूल में पढ़ता  है 
अच्छा खाता है 
पहनता है 
खेलता है !
उसे वो सब मिलता है 
जो उसे मिलना चाहिए 
वो उसका हक है !
पर जब भी मैं , किसी 
बेबस , लाचार 
बच्चे को देखती हूँ 
तो उसमें मुझे 
अपने बेटे का 
चेहरा नज़र आता है !
" बाल श्रम " अपराध है 
ऐसा कह देने से,
कानून बन जाने से 
अपराध रुका नहीं 
क्योंकि समाज और देश का 
सिस्टम नहीं बदला 
जब तक सिस्टम नहीं बदलेगा 
गरीबी का जहर 
इस देश इस समाज  में 
फैला ही रहेगा , और 
बचपन 
दम तोड़ता ही रहेगा 

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद 

Wednesday, April 3, 2013

होनहार बच्चे और उनके माता - पिता जरा ध्यान दीजिये . ... आपकी खुशियों का सवाल है ....>>> संजय कुमार

अभी पिछले दो हफ्ते पहले की बात है , हमारे शहर ग्वालियर में एक नौंवी कक्षा की होनहार स्कूल छात्रा ने अपने ही पिता की बन्दूक से अपने आप को गोली मारकर आत्महत्या कर ली , इस दिल दहला देने वाली घटना को जिसने सुना दंग रह गया , आखिर क्यों उसने ऐसा किया ?  जब कारण मालूम चला तो लोगों के होश उड़ गए .. कारण था उस छात्रा का परीक्षा में गणित का पेपर बिगड़ना .. क्या इतनी छोटी सी बात पर आत्महत्या कर लेना सही था ...?  मैं तो कहता हूँ कि , किसी भी बात पर आत्महत्या कर लेना सबसे बड़ी बुजदिली की निशानी है ! आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है अपितु इससे अनेकों प्रश्न हमारे सामने उत्पन्न होते हैं ! फिर भी इस तरह के मामले हम हर साल सुनते और देखते हैं ! इस तरह के अनेकों मामले हमारे सामने कई बार आये हैं ! जब किसी छात्र -छात्रा ने परीक्षा में फ़ैल होने पर अपने गले में फाँसी का फंदा डालकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली ?  जरा जरा सी बात पर बच्चों का इतनी जल्दी आप खो देना अपनी जान लेने की कोशिश करना .? आखिर क्यों .? क्या गुजरती होगी ऐसे माता - पिता के दिल पर जब वो अपने ही बच्चों की लाश अपने कन्धों पर ढोते होंगे , जिन कन्धों पर बैठाकर उनको उज्जवल भविष्य के सपने दिखाए ? क्या इसी दिन के लिए माता-पिता अपना पेट काटकर अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना देखते हैं ! अब इस तरह के मामलों में हम किसको दोष दें  ?  कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? शायद हम सभी जिम्मेदार हैं इस तरह के हादसों के लिए ! एक कारण ... माता - पिता द्वारा बच्चों पर अधिक प्रेशर का डालना कि,  हर हाल में , किसी भी कीमत पर अच्छे नंबरों से पास होना ही पड़ेगा, फिर चाहे इसके लिए तुम्हें २४  घंटे ही क्यों ना पढ़ना पड़े ? हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं इत्यादि ! स्कूल का प्रेशर हमेशा होनहार बच्चों पर रहता है,  क्योंकि स्कूल की रेपुटेशन का सवाल होता है जहाँ टीचर्स बच्चों पर कुछ ज्यादा ही दबाब बनाते हैं ! या फिर बच्चे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार है जो जरा जरा सी बातों पर अपनी सुध-बुध खो देते हैं ! एक दुसरे से आगे निकलने की होड़ जिसके लिए कुछ भी कर गुजरें ! सच कहूँ तो जिम्मेदार हम सभी हैं और हम सभी को इसकी जिम्मेदारी लेनी भी होगी ! क्योंकि किसी की एक गलती हमसे हमारी खुशियाँ छीन सकती हैं ! फिर भी सच तो ये है कि बच्चे तो बच्चे होते हैं उनमें बचपना भी बहुत होता है और लम्बे समय तक ये उनके साथ भी रहता है ! बच्चों में ज्ञान की कमी होती है , उन्हें सही गलत का अनुमान नहीं होता , कौन सी बात उनके मन में कब घर कर जाये इसका अनुमान हम लोग नहीं लगा सकते ! फिर भी बच्चों की उम्र के इस पड़ाव में उन्हें माता-पिता के साथ की आवश्यकता हमेशा होती है ! इस उम्र में बच्चों की सोच उनके हाव-भाव , व्यवहार में तेजी से परिवर्तन होता है ! कुछ बच्चे वक़्त के साथ ढल जाते हैं और सही गलत का अनुमान लगा लेते हैं फिर भी सभी बच्चों को उचित मार्ग-दर्शन की आवश्यकता होती है ! जब से हमने अपने आप को जरूरत से ज्यादा व्यस्त कर लिया है तब से हम लोगों का ध्यान अपने बच्चों से और उनकी दिनचर्या , क्रिया-कलाप , व्यवहार से पूरी तरह हट गया है और आज अधिकांश परिवारों में  यही स्थिति है ! बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार , स्नेह , मार्ग-दर्शन , उनके लिए समय निकालना किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है ! अगर बच्चों के लिए माता-पिता के पास समय नहीं है तो इस तरह की  स्थिति उनके साथ भी निर्मित हो सकती है ! खास तौर पर होनहार बच्चे इस तरह की वारदात को ज्यादा अंजाम देते हैं ! क्योंकि वो इस बात को बहुत गहराई से सोचते हैं और असफल होने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस होगी ! बस यहीं वो गलती कर जाते हैं  ! माता-पिता जब बच्चों को ज्यादा होशियार समझने लगते हैं तो उनका भी ध्यान बच्चों से उनकी दिनचर्या से हट जाता है और वो बड़ी बेफिक्री महसूस करते हैं ! यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो आप अलर्ट हो जाइये !
मैं सभी होनहार बच्चों से गुजारिश करूंगा कि , हमारा जीवन बहुत ही अनमोल है और ये जीवन हमें एक बार ही मिलता है ! हमें कभी भी छोटी - छोटी असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए और छोटी - छोटी सफलता पर किसी भी तरह का घमंड नहीं करना चाहिए ! क्योंकि ये दोनों स्थिति हमारे लिए हितकर नहीं हैं ! क्योंकि जान है तो जहान है और हम जिन्दा रह कर ही इतिहास बना सकते हैं ! सभी माता - पिता से गुजारिश है , कृपया अपने बच्चों को अपना समय दीजिये और जीवन उपयोगी बातों से उन्हें अवगत करायें ! 
विशेष ......>> जिन घरों में नन्हें - मुन्हें बच्चें हैं उन घरों में कृपया अपनों की ही मौत का सामान ना रखें जिन्हें हम हथियार कहतें हैं क्योंकि जब गोली चलती है तो वो ये नहीं देखती की कौन अपना है कौन पराया वो सिर्फ खुशियाँ छीनती है ..... इसलिए कहता हूँ कि , ... ये सवाल आपकी अपनी खुशियों का है !  

(एक छोटी से बात )

धन्यवाद 

Monday, April 1, 2013

अलविदा .... दोस्तों ..........>>> संजय कुमार

आज आप सभी को अलविदा कहते हुए मुझे बड़ा ही दुःख हो रहा है ! डरिये मत मैं जीवन को अलविदा नहीं कह रहा हूँ बल्कि ब्लॉग लेखन को अलविदा कह रहा हूँ क्योंकि अब ये मेरी मजबूरी है जैसे देश में घोटाले करना सरकार की मजबूरी है ठीक वैसे ही मेरी भी है पिछले तीन सालों से मैं  अपने ब्लॉग पर अपनी ढेर सारी पोस्टें आपको जबरदस्ती पढ़वाता रहा ,यहाँ भी मेरी मजबूरी थी ! सोचा आप सभी का मनोरंजन होगा ! मनोरंजन हुआ या नहीं मेरी तो समझ में  ही नहीं आया .... मैं क्या करता  मैं तो छोटा -मोटा ब्लॉगर हूँ कोई राईटर तो हूँ नहीं जो सबकी पसंद का लिख सकूँ , और ऐसा लिख सकूँ जो आप सभी को पसंद भी आये ! फिर भी मुझे तो जो आता गाया सो सो मैं लिखता गया ! आप सभी ने मेरी ३१०  पोस्टों को झेला ये मेरे लिए फक्र की बात है ! आप सभी ने भी बड़ी ही वीरता दिखाई और दिलेरी से मेरी पोस्टों को पढ़ा और  अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देकर मेरा उत्साहवर्धन किया  जिसका मैं सदा आभारी रहूँगा ! सोचता हूँ मेरे लिखने का आखिर मुझे क्या फायदा हुआ , ना तो मैंने आज तक कोई अवार्ड जीता है और ना ही कोई पुरुष्कार , ले -दे कर दो चार पत्रिकाओं में कुछ पोस्टें छप गयी और कुछ समाचार पत्रों में .... इससे आखिर होता क्या है ....?  सच तो ये हैं कि अब लिखने का मन नहीं होता , कारण तो बहुत हैं फिर भी सबसे बड़ा कारण तो समय है जो मेरे पास अब बिलकुल भी नहीं हैं ! अपने कार्यक्षेत्र में बढती जिम्मेदारियों के कारण लेखन के लिए समय का ना निकाल पाना ! जब आप किसी काम के लिए समय नहीं निकाल पाते तो उससे जुड़े होने का कोई मतलब नहीं है ! मेरा ऐसा मानना है कि , हमें ऐसे काम से अलविदा ही कह देना चाहिए ! अब मैं जब भी सिस्टम पर बैठता हूँ तो मेरा मन ब्लॉग खोलने और उस पर कुछ लिखने का बिलकुल भी नहीं करता  बल्कि मैं जब " फेसबुक " खोलता हूँ तो उससे दूर जाने का मन नहीं करता ....अब जिससे दूर रहा ना जाय तो उसके बारे में सोचना तो पड़ेगा ही ! एक बात सच बोलूं  मुझे ऐसा लगता है कि , अब ब्लॉग पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम हो गयी है ! जब से " फेसबुक " आया है तब से ब्लॉग तो " दूरदर्शन " के जैसा हो गया है ......... फेसबुक , ट्विटर, की दुनिया बड़ी ही रंग - रंगीली है और ब्लॉग की दुनिया वही .... शेरो - शायरी , साहित्यिक रचनायें , कवितायेँ , गीत ग़ज़ल और क्या ....... इसके विपरीत फेसबुक पर ...... रंग-बिरंगी तस्वीरें , वाद- विवाद भरी बातें , अपनी सोती-जागती तस्वीरों पर हर किसी की वाह - वाही लूटना , एक दुसरे से चैट पर बातें करना ....... इत्यादि 
अब भई चमक - दमक की दुनिया तो हर किसी को भाति है ...... आज मुझे भी भा रही है ! 
आखिर क्या रखा  है ब्लॉग में ...... अब मैं भी औरों की तरह  फेसबुक पर हाँथ आजमाना चाहता हूँ ! इसलिए तो अब ब्लॉग को अलविदा और ..... फेसबुक ,ट्विटर का तहे दिल से स्वागत कर रहा हूँ ! 
हालांकि ब्लॉग ने मुझे तीन सालों में ढेर सारे अच्छे मित्र भी दिए हैं .. लेकिन फेसबुक पर तो मैं २-४ हज़ार मित्र तो बना ही लूँगा ! अब नए मित्रों की तलाश में .... ब्लॉग को अलविदा ......

















अरे भई मैं ये क्या मुर्खता कर गया ....... जिस ब्लॉग ने मेरी पहचान बनाई है मैंने उसे ही अलविदा कह दिया ! क्या करूँ अपनी तो आदत है ! अब एक बार जो मैंने कमेटमेंट  कर दिया तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता ......... फिर चाहे वो फर्स्ट मार्च  हो या फर्स्ट अप्रैल फूल ! अलविदा तो अलविदा 


धन्यवाद 
( मुर्खता दिवस की शुभकामनयें ) 

Saturday, March 23, 2013

शहीदों को नमन ...... उनके जोश और जज्बे को सलाम .......>>> संजय कुमार

आज " शहीद दिवस " पर मैं सभी शहीद क्रांतिकारियों और उनके जोशीले व्यक्तित्व को शत शत नमन करता हूँ ! आज की युवा पीढ़ी के लिए हमारे ये वीर शहीद एक मिशाल हैं ... जो जज्बा देश पर मर - मिटने के लिए इनके पास था , आज उसी जज्बे की जरुरत इस देश को आज के युवाओं से है ! किन्तु आज का युवा जोश में कम अपितु आवेश में अधिक रहता है ! जोश और आवेश में अंतर तो बहुत नहीं हैं किन्तु इनके अर्थ हमारे लिए अलग अलग हो सकते हैं ! एक जोशीला युवक अपने समाज और देश की स्थिति में बदलाव ला सकता है उनको सुधर सकता है ! किन्तु एक आवेशित युवक अपना और अपने समाज का सिर्फ अहित ही कर सकता है क्योकि आवेश का एक रूप गुस्सा भी होता है और गुस्से में किये गए काम का फल कभी सकारात्मक नहीं होता ! जोश हमें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है ! जीवन में सफलता हांसिल करने के लिए हमारे अन्दर जोश का होना अत्यंत आवश्यक है ! जोश और आवेश हर इंसान के अन्दर होता है ! मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ सिर्फ सिर्फ आज के युवाओं की , उनके जोश और आवेश की ! किन्तु आज के युवाओं के अन्दर का जोश और आवेश दोनों ही उनके वर्तमान और भविष्य लिए  उनके परिवार के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं ! उदाहरण के तौर पर आपको एक पुरानी घटना से अवगत कराता हूँ , हालांकि इस तरह की घटनाएँ आज देश के हर छोटे -बड़े शहरों में आये दिन  होती रहती हैं  ! चार जोशीले युवक तेज गति से वाहन चलाने की शर्त लगाते हैं , वो भी रात के समय  शहर के व्यस्त हाइवे पर सिर्फ जोश में या यूँ कहें आवेश में ) रेस शुरू होती है और चंद मिनटों में सब कुछ खत्म ! एक वाईक पर सवार दो युवक सामने से तेज गति से आ रहे ट्रक से टकरा जाते हैं और एक मौके पर ही दम तोड़ देता है और दूसरा बुरी तरह घायल होकर अपना जीवन बचाने के लिए हॉस्पिटल में मौत से संघर्ष करता है , वो बच जाता है किन्तु महीनों बिस्तर पर पड़े रहने के बाद , क्या ये आवेश था या जोश इसे हम जोश कहेंगे किन्तु परिणाम नकारात्मक ! एक और उदाहरण ..... चार दोस्त किसी पार्टी में आपस में झगड़ते हैं और उन्हीं में से एक दोस्त आवेश में आकर वियर की बोतल फोड़कर एक के पेट में घुसेड देता है इसे हम जोश नहीं आवेश कहेंगे यहाँ भी परिणाम नकारात्मक  ! जिस जोश को हम प्रेरणादायक कहते हैं बही जोश आज हमसे हमारी खुशियाँ छीन रहा है हमारी खुशियाँ मातम में बदल रहीं हैं ! 
आजादी के पूर्व युवाओं में जो जोश होता था और उसके जो परिणाम आते थे वो सकारात्मक होते थे ! " भगत सिंह " चंद्रशेखर आजाद " राम-प्रसाद बिस्मिल " सुभाष चन्द्र बोस " जैसे क्रांतिकारियों को हम जोशीले युवकों के रूप में जानते हैं  ! इन सभी के जोश ने भारत को आजादी दिलाई ! ये सभी जोश से भरपूर थे आवेश से नहीं ! किन्तु आज का युवा जोश में भी है और आवेश में भी ! बदलते परिवेश के साथ आज के युवाओं का जोश सकारात्मक कम नकारात्मक ज्यादा है ! आज युवाओं में जोश है तो उल्टी-सीधी शर्त लगाने का , मसलन वाईक - कार रेस , देर रात तक पार्टियाँ करने का जोश , शराब पीने का जोश , नशा करने का जोश , बिना बात लड़ने - झगड़ने का जोश , जोश में आकर सिर्फ गलत काम करने का जोश जिसके परिणाम कभी भी सकारात्मक नहीं होते ! देखा जाय तो देश में सकारात्मक जोश वाले युवाओं का अकाल है ! आज आवेशित युवा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं ! युवाओं के जोश और आवेश के नकारात्मक परिणाम का फल या सजा आज उनके परिवार को भुगतनी पड़ रही है ! जब कभी कोई किसी दुर्घटना में मारा जाता है तो हम सबसे पहले जोश और आवेश को ही दोषी मानते हैं ! आज के युवाओं में धैर्य और सब्र नाम की चीज बिलकुल भी नहीं हैं ! आज हमारे देश का युवा नकारात्मक पहलुओं की ओर ज्यादा तेजी से अग्रसर हो रहा है और  इसके कई कारण हो सकते हैं जरुरत से ज्यादा आजादी , माता-पिता द्वारा बच्चों की हर खवाहिश को बिना सोचे समझे पूरी करना , संस्कारों की कमी , नियंत्रण का अभाव , सही मार्ग-दर्शन का ना होना ! बहुत सी बातें हैं जो युवाओं के जोश का नकारात्मक पहलु हमारे सामने लाती हैं ! युवा इस देश का भविष्य हैं ! इस देश को जोशीले युवकों की आवश्यकता है , वो जोश जो देश की तस्वीर बदल दे , ना कि उनकी तस्वीर पर फूलों की माला ! 
युवाओं अभी भी समय है अपने जोश को सकारात्मक बनाओ ! हमारे देश के वीर शहीदों को अपना आदर्श बनायें ना की किन्हीं फ़िल्मी हस्तियों को ......
शहीदों को नमन ...... उनके जोश और जज्बे को सलाम 

धन्यवाद 



Friday, March 8, 2013

महिला दिवस अब प्रतिदिन मनाना चाहिए ( Women's Day ) .....>>> संजय कुमार

सच कहूँ तो अब प्रतिदिन हमारे देश में महिला दिवस मनाया जाता है ! फर्क सिर्फ इतना है कि, महिलाओं का सम्मान हम सिर्फ प्रचलित " महिला दिवस " पर ही करते हैं ! अब तो प्रतिदिन हमें महिला दिवस मनाना चाहिए ! क्योंकि आज देश में जो स्थिति महिलाओं की है उसे देखते हुए यह बात अब निर्विरोध बिलकुल सच है !आज प्रतिदिन की चर्चा में सिर्फ " नारी " और सिर्फ नारी ही रह गयी है ! छेड़खानी , बलात्कार , सामूहिक बलात्कार की शिकार होती नारी , इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली घटनाओं से प्रतिदिन होता नारी का शोषण उसकी मर्यादाओं का हनन , पुलिस द्वारा सरे आम सड़कों पर जानवरों के जैसा पीटा जाना , घर की चाहर दिवारी में प्रतिदिन होती घरेलु हिंसा , पारिवारिक सदस्यों द्वारा यौन शोषण की शिकार होती नारी , स्कूल, कॉलेज , ऑफिस में अपने सहकर्मियों द्वारा शोषण का शिकार नारी , ग्रामीण क्षेत्रों में दबंगों का शिकार नारी , आधुनिक भारत में " डायन " के नाम से जिन्दा जलाई जाने वाली नारी , शहरी क्षेत्रों में " जिस्मफरोशी " के दलदल में फँसती नारी , चकाचौंध भरी दुनिया में बढ़ता नारी देह प्रदर्शन , .... टेलीविजन , विज्ञापन , फिल्मों में खुलकर नारी देह का प्रदर्शन , ( जब तक नारी देह नहीं दिखाएगी ना विज्ञापन चलेगा और ना फ़िल्में ) .. ... एक पूरे बर्ष में कोई एक दिन बताएं जिस दिन नारी चर्चा का बिषय ना रही हो ! चर्चाओं में आना अच्छी बात है पर इस तरह नहीं , क्योंकि ये नारी जाति का अपमान है ....... ये इंसानियत और मानव धर्म का अपमान है !
       
" महिला दिवस " पर हम निसंकोच महिलाओं के मान-सम्मान की बात करते हैं ! शायद इसी दिन हम उन्हें याद करते हैं मतलब उनके मान-सम्मान के लिए ! वर्ना कुछ महिलाओं का तो पूरा जीवन निकल जाता है , यह जानने के लिए की महिला - दिवस आखिर होता क्या है ? क्या होता है इस दिन ? क्या कोई अवार्ड दिया जाता है ? या बड़ी - बड़ी बातें कर यूँ ही दिन निकाल देते हैं ! सिर्फ इसी दिन हम  महिलाओं के मान-सम्मान के बारे में क्यों सोचते हैं  बाकी दिनों में क्यों नहीं ? लेकिन जो मान - सम्मान की असली हक़दार है उनका मान-सम्मान हम कब करेंगे क्या वो दिन आएगा ? अब उनका सम्मान आवश्यक हो गया है ! आज महिलायें पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं बल्कि शोषण में तो सर्वोपरि हैं ! फिर भी नारी तो महान है क्योंकि उसके जितने कष्ट सहने की क्षमता किसी में भी नहीं है ! आज महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं ! आज महिलाएं प्रगतिशील है ! आज की नारी आज़ाद है अपनी बात सबके समक्ष रखने के लिए , अपने विचार व्यक्त करने के लिए ! आज महिलाएं चूल्हा - चौका छोड़ देश की तरक्की में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं ! आज महिलाओं ने देश को विश्व स्तर पर काफी ऊंचा उठाया है ! आज महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी उपलब्धि दर्ज कराई है ! आज देश की राजनीति में महिलाओं का क्या रुतबा है , हम सब इस बात को भली-भांति जानते हैं ! खेल क्षेत्र हो , ज्ञान - विज्ञानं , टेलीविजन , मीडिया , शिक्षा, लेखन आदि अनेक क्षेत्रों में अपना दबदबा दिखाया है ! कई क्षेत्रों में दिए गए शानदार योगदान पर आज हम नारी का गुणगान करने से नहीं थकते ! नारी तो हमेशा पुरुषों का आधार रही है ! सब कुछ कहीं ना कहीं नारी पर आकर ही टिकता है या यूँ भी कह सकते हैं की नारी नहीं तो पुरुष भी नहीं ! कभी पुरुषों की सफलता के पीछे नारी ! संस्कारों की जननी नारी ! खानदान , वंश की परंपरा, रीति-रिवाजों को मरते दम तक संभाल कर रखती है नारी ! इसलिए हमारे देश में नारी को " देवी " का दर्जा प्राप्त है ! ये तो प्रक्रति का नियम है एक पहलु अच्छा तो एक बुरा ! हम कहते हैं कि , आज की नारी आजाद है अपने विचारों को प्रगट करने के लिए , आजाद पुरुषों के साथ -साथ चलने के लिए है ! शायद ऐसा कहने में हमें अच्छा लगता है ! क्या हम सब इस बात का दिखाबा करते हैं , या हम दिखाबा पसंद लोग हैं ? आज तक हम लोग उन्हीं पहुंची हुई हस्तियों को ही महिला दिवस पर याद करते हैं या हम उन्ही हस्तियों का गुणगान करते हैं , सम्मान में कसीदे पढ़े जाते हैं जिनके बारे में हम जानते हैं देखते हैं या हमें बताया जाता है ! इस चकाचौंध में हम कहीं ना कहीं अपनों को अनदेखा करते हैं ! हम कभी भी अपने घर की महिलाओं की तरफ ध्यान नहीं देते, कहावत तो आपने सुनी होगी " घर की मुर्गी दाल बराबर " शायद हम उन महिलाओं को भूल जाते हैं , जो वाकई में कहीं ना कहीं महिला दिवस की असली हकदार हैं ! भले ही उन्होंने जग में अपना नाम ना किया हो, फिर भी उनका जज्बा , हालातों से लड़ने की हिम्मत , सहनशीलता ऐसी हजारों खूबियों से भरी होती है " भारतीय सम्पूर्ण नारी " जो सम्मान के लायक है !जिसने मेहनत की पर मुकाम हासिल ना किया हो तो, तो क्या हम उसको भूल जायेंगे ? मेरा सोचना है हमें उन महिलाओं को भी याद करना चाहिए जो अपने आस-पास हैं और कहीं ना कहीं महिला दिवस पर सम्मान पाने की हक़दार हैं ! जन्म देने वाली " माँ " पत्नि , बेटी , बहन ये सभी हकदार हैं सम्मान की ! एक मजदूर औरत जो एक एक ईंट के साथ मेहनत करके सुंदर भवनों को बनाने में अपना योगदान देती है और तब जाकर कहीं हम अपने ऊंचे महलों में ऐशोआराम से रहते हैं शायद ही कभी किसी ने आज तक उसका सम्मान किया हो , शायद हम उसका सम्मान कभी कर भी ना सकेंगे ! जीवन भर कड़ी मेहनत कर हम लोगों के भोजन की व्यवस्था करने वाला किसान और उसकी कड़ी मेहनत में बड़ी भूमिका निभाने वाली उसकी पत्नि की लेकिन आज तक उसकी भूमिका सिर्फ भूमिका बनकर ही रह गयी है , ये भी हक़दार हैं सम्मान की ! बहुत सी महिलाएं ऐशी हैं जो आज भी बड़ी ईमानदारी के साथ अपना काम कर रही हैं किन्तु उनके मान-सम्मान की किसी को भी चिंता नहीं हैं ,जीवन में एक बार उन्हें उनका सम्मान मिलना चाहिए ! आज हमें उन सभी नारियों का सम्मान करना होगा जो लडती है अपने मान-सम्मान के लिए , अपने अधिकार के लिए ! सम्मान करना होगा उन सभी का जिन्होंने हर बुरी परिस्थिति में पुरुषों का साथ दिया और कंधे से कन्धा मिलाकर कठिन पथ पर साथ - साथ चलीं , सम्मान करना होगा हर उस नारी  का जो हम सब से कहीं अधिक मेहनत करती है !

मेरी तरफ से विश्व की सभी महिलाओं को इस महिला दिवस पर नमन ! जो मेरी याद में हैं और जो गुमनाम हैं ...... में नमन करता हूँ समस्त नारी ब्लोगर्स को ..... नमन करता हूँ उन सभी को जो देश का नाम रौशन कर रही है !
 

धन्यवाद