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Friday, April 26, 2013

गरीबी का जहर और बाल श्रम .......>>> गार्गी की कलम से

मैंने अपने बेटे को देखा 
प्लेटफ़ॉर्म पर हाँथ फैलाते हुए 
ढावों पर चाय - पानी देते हुए 
गलियों में कचरा बीनते हुए 
खाने - पीने की चीजें चोरी करने पर 
पब्लिक से मार खाते हुए ........
यूँ तो मेरा  बेटा 
अच्छे स्कूल में पढ़ता  है 
अच्छा खाता है 
पहनता है 
खेलता है !
उसे वो सब मिलता है 
जो उसे मिलना चाहिए 
वो उसका हक है !
पर जब भी मैं , किसी 
बेबस , लाचार 
बच्चे को देखती हूँ 
तो उसमें मुझे 
अपने बेटे का 
चेहरा नज़र आता है !
" बाल श्रम " अपराध है 
ऐसा कह देने से,
कानून बन जाने से 
अपराध रुका नहीं 
क्योंकि समाज और देश का 
सिस्टम नहीं बदला 
जब तक सिस्टम नहीं बदलेगा 
गरीबी का जहर 
इस देश इस समाज  में 
फैला ही रहेगा , और 
बचपन 
दम तोड़ता ही रहेगा 

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद 

Friday, October 26, 2012

बचपन और यादें ......... >>> गार्गी की कलम से

किसी आलौकिकता से 
कम नहीं होते 
बचपन छुटपन के दिन ,
बहुत ज्यादा तड़पा जाता है मुझे 
वर्तमान और बचपन की 
यादों का संगम 
" माँ " आपकी गोद सा सुकून 
ईश्वर की पूजा में भी नहीं है शायद 
अब जब भी आपकी याद आती है 
तो ईश्वर में आपका 
चेहरा , कर , कदम 
उकेरता है , ये मन
" भईया " अपने बड़े बेटे में 
आप दिखाई पड़ते हैं मुझे 
और छोटे में खुदकी सी 
नादानियाँ नजर आती हैं मुझे 
" माँ " आपका वो छोटा सा कमरा , जहाँ 
बरसात में हमें , गोद में लेकर 
बैठ जाया करती थी वहां 
आज उस कमरे के आगे 
सारा जहाँ छोटा नजर आता है मुझे !
मैं तो चाहती हूँ कि , 
बचपन भूल जाऊं तुझे 
पर हर वार तुझे भूलने में 
नाकाम हो जाती हूँ मैं !

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद