Friday, October 26, 2012

बचपन और यादें ......... >>> गार्गी की कलम से

किसी आलौकिकता से 
कम नहीं होते 
बचपन छुटपन के दिन ,
बहुत ज्यादा तड़पा जाता है मुझे 
वर्तमान और बचपन की 
यादों का संगम 
" माँ " आपकी गोद सा सुकून 
ईश्वर की पूजा में भी नहीं है शायद 
अब जब भी आपकी याद आती है 
तो ईश्वर में आपका 
चेहरा , कर , कदम 
उकेरता है , ये मन
" भईया " अपने बड़े बेटे में 
आप दिखाई पड़ते हैं मुझे 
और छोटे में खुदकी सी 
नादानियाँ नजर आती हैं मुझे 
" माँ " आपका वो छोटा सा कमरा , जहाँ 
बरसात में हमें , गोद में लेकर 
बैठ जाया करती थी वहां 
आज उस कमरे के आगे 
सारा जहाँ छोटा नजर आता है मुझे !
मैं तो चाहती हूँ कि , 
बचपन भूल जाऊं तुझे 
पर हर वार तुझे भूलने में 
नाकाम हो जाती हूँ मैं !

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद 

7 comments:

  1. हे दुर्गे ब्रह्मवादिनी, माँ का भावे रूप ।

    होय माघ की शीत या, तपे जेठ की धूप ।
    तपे जेठ की धूप, कठिनाई से सदा उबारे ।

    याद तुम्हारी बसी, कोठरी घर चौबारे ।

    अग्रज दीदी अनुज, बुआ चाचा सब भावें ।

    किन्तु श्रेष्ठ माँ गोद, भोगनें भगवन आयें ।।

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  2. हम भी अपने पैतृक घर में बचपन की स्मृतियाँ जी रहे हैं।

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. बचपन की यादों को भुलाया नही जा सकता,,,,

    RECENT POST LINK ...: विजयादशमी,,,

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  5. बचपन ... मासूमियत से बढकर क्या है ,जो उसे भूलना आसान हो

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