Saturday, September 25, 2010

अब तो चले जाओ तुम ..... ( व्यंग्य ) ....>>> संजय कुमार

अब तो चले जाओ तुम, सुन लो मेरी करुण पुकार , मैं कब से कह रहा हूँ , लेकिन तुम हो की , अब तो जाने का नाम ही नहीं ले रहे हो ! माना हमने तुम्हें बुलाया , माना हमने तुम्हे बुलाने की लिए तुमसे लाख मिन्नतें की , यज्ञ- अनुष्ठान किये ! मेढंक-मेंढकी की शादी तक करवाई ! और पता नहीं क्या-क्या नहीं करना पड़ा, हम इंसानों को , तुम्हें बुलाने के लिए ! और इस बार तुम ऐसे आये की अब जाने का नाम ही नहीं ले रहे ! यह तो वही बात हो गयी " अतिथि तुम कब जाओगे " इस बार तो तुमने हद ही कर दी, इस बार इतना रौद्र रूप लेकर क्यों आये ? इस बार तुमने आकर सब कुछ तहस-नहस और तबाह कर दिया ! आज तुम्हारी बजह से देश को शर्मिंदा होना पड़ रहा है ! आज देश जैसे-तैसे अपनी इज्जत बचाने में लगा है ! लेकिन तुम हो कि , अपनी हठ नहीं छोड़ रहे हो ! " हे मानसून देवता " अब वश बहुत हो गया ! पूरा देश अब यही चाहता है कि , अब आप बापस चले जाओ ! इस बार आपने जो किया बह ठीक नहीं किया ! इस बार आपने पूरे देश के साथ - साथ देश कि राजधानी तक को नहीं छोड़ा ! जहाँ से तुम्हारे आने -जाने की सूचना पूरे देश को मिलती है ! इस बार तो तुमने उसे भी चकमा दे दिया ! तुने इस बार बहुत लोगों को बेसहारा कर दिया ! उनसे उनका सब कुछ छीन लिया ! " हे मानसून देवता " तेरे खेल भी बड़े अजीब हैं ! जिस जगह तेरी सबसे ज्यादा जरूरत होती हैं , वहां तू जाता नहीं और जहाँ नहीं जाना चाहिए वहां बिन बुलाये ही चला जाता है ! आज तेरे कारण कितने किसान आत्महत्या कर रहे हैं , क्या तुझे इसका जरा भी ध्यान नहीं ! हर बार तू अपने मन की करता है ! इस बार भी तुने अपने मन की , की है ! लेकिन इस बार कई लोग तुझसे नाराज हैं ! खासकर देश की सरकार ! अब तू उनकी नाराजगी को खत्म कर , इस बार चला जा , हम सब तुझे विश्वास दिलाते हैं , अगले साल हम फिर तुझे बुलाएँगे तेरे सामने शीश झुकायेंगे , बंधुआ मजदूरों की तरह हाँथ जोड़ खड़े रहेंगे ! जब तक तू आता नहीं ! लेकिन इस बार ........... चला जा तू ............. " हे मानसून देवता "

जैसे-तैसे मेरी करुण पुकार " मानसून देवता " ने तो सुन ली ! हम सब उनका धन्यवाद करते है ! किन्तु समस्या अभी खत्म नहीं हुई ! मानसून देवता के जाने के बाद एक सबसे बड़ी समस्या आज हमारे सामने खडी है ! जिस तरह मानसून देवता से गुहार की उसी तरह इनको भी मनाने की कोशिश कर रहे हैं ! शायद ये मान जाएँ ! पर लगता नहीं ! ये हैं " डेंगू महाराज " इनसे बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ! फिर भी " हे डेंगू महाराज " आप से हाथ जोड़ विनती है, आप कुछ दिनों के लिए देश की राजधानी को छोड़कर कहीं और चले जाओ ! आज देश अपनी लाज बचाने के लिए तुमसे गुहार लगा रहा है ! आज देश और शर्मिंदा ना हो इसलिए तुम्हारे आगे हाँथ जोड़ रहे हैं ! तुम्हारे आतंक से आज विदेशी खिलाडी अपने देश में आना नहीं चाहते ! उस पर तुम भी देश को नीचा दिखाने पर तुले हुए हो ! आज तुम्हारा डर- आतंक , हमारी सरकार की चिंता का विषय बन गया है ! कुछ दिनों के लिए सही , तुम कहीं और जाकर अपना पेट भरो , तुम्हें राजधानी के अलावा भी कई सड़े हुए पानी के भरे गड्ढे मिल जायेंगे ! क्योंकि इस बार मानसून देवता ने देश में ऐसा कोई गड्ढा नहीं छोड़ा जो खाली हो ! जिस तरह देश के कई मंत्री -संत्री आला -अधिकारी सिर्फ " किराये " में ही सारे गड्ढे भर चुके हैं ! अब देश की इज्जत तेरे ही हांथो में हैं ! विनती हैं तुझसे ... तू देश की सोच, देश में होने बाले अंतराष्ट्रीय खेलों को आसानी से होने दे और हमें भरोसा दिला कि तू तब तक दिल्ली नहीं आएगा जब तक सारे देशी-विदेशी महमान अपने-अपने घर सुरक्षित नहीं लौट जाते !

" हे मानसून देवता " " हे डेंगू महाराज " अब तो चले जाओ .... तुम

धन्यवाद

6 comments:

  1. संजय जी आपके व्यंग्य हर दिन पैने और और भी असरकारी होते जा रहे हैं.. ऐसे ही हिन्दी सेवा करते रहिये..

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    कहानी ऐसे बनी– 5, छोड़ झार मुझे डूबन दे !, राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

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  3. बढ़िया यंग्य है भाई ।

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