Wednesday, December 26, 2012

करो होंसले बुलंद , आवाज बुलंद ........>>> गार्गी की कलम से

फूल बनने से पूर्व ही 
बिखर जातीं हैं कलियाँ ,
मिल जाते हैं रावण 
हर घर , हर गलियां
ना जाने कितनी लड़कियों को 
पलकों से ढँक आँखें ,
रोते देख लो ,
झेंपती, उस मासूम को 
माँ की गोद में लिपटी 
सिसकती देख लो !
झूठी इज्जत की चादर से 
घर को क्यों ढंकती हो ?
अन्यायी , निर्दयी समाज से 
क्यों डरती हो ?
विश्वास और सुरक्षा ही 
छीन ली गयी हो तब 
क्या खोने से डरती हो ?
करो संचय अपने में 
नयी शक्ति का ,
करो होंसले बुलंद , आवाज बुलंद 
करो विरोध इसका 
राम नहीं आयेंगे ,
है इन्तजार बेकार 
करना होगा तुम्हें ही 
रावण का संहार !
तब ही बच पाएंगी 
बगीचे की कलियाँ ,
बन पाएंगी सुगंध बिखेरती 
फूल , तारो ताजा 
करो होंसले बुलंद .............. करो होंसले बुलंद 

प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद 

10 comments:

  1. शानदार लेखन,
    जारी रहिये,
    बधाई !!!

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  2. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  3. बहुत ही सुंदर प्रेरक प्रस्तुति,,,,

    recent post : नववर्ष की बधाई

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  4. सुन्दर प्रेरणादायी रचना..

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  5. हो विरोध इस पशु प्रवृत्ति का।

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  6. कुशासन खत्म करने के लिए खुद ही आगे आना होगा....

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