Wednesday, June 13, 2012

पिता के दर्द को भी समझें .....>>> संजय कुमार

भारतीय  संस्कारों में  माता -पिता का स्थान ईश्वर से भी बढकर माना गया  है ! किसी भी इंसान की उत्पत्ति  माता-पिता के द्वारा ही होती    है , उन्हीं के कारण वो इस दुनिया को देख पाता  है , एक  कारण यह भी है कि,  एक बच्चा जन्म के बाद सबसे पहले अपने माता- पिता को ही जानता है इसलिए उसकी दुनिया इन्हीं से होती है , बाकि सब उसके बाद उसे बताया जाता है ! एक  माँ अपना सबसे ज्यादा समय अपने बच्चों के साथ गुजारती है , इसलिए सबसे ज्यादा प्यार वही करती है , और  पिता रहता है दिन भर बाहर वह भी सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए ! इसलिए कभी- कभी कुछ बच्चों को ये लगता है कि शायद पिता उनको उतना प्यार नहीं करते  जितना की उनकी  माँ उन्हें  करती है ! और कभी कभी यह बात बच्चों के मन में  घर कर जाती है ! पर एक पिता का फर्ज होता है ,कि वह अपने परिवार और बच्चों की  देखभाल करे ! जीवन की  हर सुख सुविधाओं और  जरूरतों को पूरा करे , और वह ऐसा ही करता है ,  अपना पूरा जीवन समर्पित करता है अपने परिवार और अपने बच्चों के लिए ! जीवन भर हर कष्ट सहते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करता है ! घर पर  बच्चों कि जिम्मेदारी माँ के हाँथ में  रहती है , और बाहर पिता की ,  जब बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय अपनी माँ के साथ  गुजारते हैं  , तो कई बार यह देखा गया है की  बच्चे माँ के लाडले हो जाते हैं  और उन्हें कई बार यह लगता है की उन्हें अब पिता के प्यार की जरूरत ही नहीं है  और वह इस गलत फहमी का शिकार हो जाते हैं कि, हमें तो हमारे पिता प्यार ही नहीं करते ,  और जब कभी बच्चों के सामने माँ के द्वारा पिता से यह बोला जाता है कि, तुम्हे तो बच्चों की  जरा भी फिक्र नहीं हैं , और न तुम्हें बच्चों से प्यार है !  इस तरह की  बातें जब बच्चे रोज - रोज सुनते हैं, तो एक गलत असर उनके दिमाग पर पड़ता है ! और धीरे एक विरोध की  भावना पिता के लिए उत्पन्न हो जाती है ! घर में  जब माँ हर बात में  बच्चे का पक्ष लेने लगे तो क्या होगा ? चाहे सही हो या गलत , अगर ऐसा है तो भविष्य में हमारे सामने कई समस्याएं उन्पन्न हो सकती हैं ! आज आधुनिकता इतनी बढ़ गयी है  कि व्यक्ति के पास तो वैसे  ही समय नहीं हैं अपने परिवार को समय देने का , उस पर हमारे बीच से  संस्कारों का धीरे-धीरे पतन होना !  आज कई परिवारों  में  यह देखने को मिल जाता है  कि , जिस पिता ने अपना खून-पसीना बहाकर जिन बच्चों को बड़ा किया, उन्हें समाज में  उठने बैठने लायक बनाया , जीवन की हर अच्छी और बुरी बात का ज्ञान कराया , उनको उनके पैरों पर खड़ा किया ,  आज वही बच्चे उन्हें  प्रतिदिन अपमान और तिरस्कार दे रहे हैं ! आज कई जगह यह भी देखने को मिल जाता है की , माँ  के अंधे लाड-प्यार की कीमत पिता को भुगतनी पड़ती है जो किसी भी पिता के दिल को सिर्फ आघात पहुंचाती है और एक ऐसी पीड़ा जो वो बयां नहीं कर पाता  !  एक  पिता जो बच्चों की बचपन से लेकर जवानी, शादी और शादी के बाद की सभी छोटी मोटी गलतियों को बिना किसी झिझक के माफ़ कर देता है , आज  वहीँ  जब कभी पिता द्वारा अगर कोई गलती हो जाये तो वही बच्चे जरा भी नहीं सोचते  अपने ही पिता का अपमान करने से ! एक पिता अपने बच्चों का जिन्दगी भर सिर्फ भला सोचता है  पर आज के इस कलियुग में " राम "  अब कहीं दिखाई नहीं देते पर "  दशरथ " आज भी बहुत हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चों से प्यार करते हैं , और उनकी जरा सी तकलीफ में  अपना सब कुछ न्योछावर  करने को तत्पर तैयार  रहते हैं किन्तु  आज  उनकी संतान नहीं !  आखिर एक पिता अपने बच्चों से क्या चाहता है  ?  थोडा सा प्यार , पिता का मान-सम्मान और कुछ नहीं !जिस तरह माँ की ममता महान होती है , उसी तरह पिता का प्यार भी महान होता है ! 
एक गुजारिश :  ना करें अपने पिता का अपमान , भला हो या बुरा , पिता तो पिता ही होता है , उसका दर्द भी समझें ..................................।


धन्यवाद  

16 comments:

  1. सार्थक पोस्ट के लिए साधुवाद.

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  2. आपकी पोस्ट कल 14/6/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा - 902 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  3. सच है पिता भी उतना ही प्यार करते हैं,जितना माँ...और बच्चों के लिए पिता का प्यार भी उतना ही जरूरी है जितना माँ का...

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  4. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/06/4.html

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  5. माँ बाप समान रूप से बच्चों को प्यार करते है,मेरा मानना है कि बाप ज्यादा बच्चों की जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है,,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: विचार,,,,

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  6. सही मायनों में देखा जाये तो पिता का दर्द वाकई बहुत गहरा होता हैं लेकिन वह बयाँ नहीं कर पाता ! आपने बिलकुल सही शव्दों में सही प्रस्तुति दी !

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  7. पिता का दर्द बहुत गहरा होता हैं !

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  8. bhabnawo ko bantana bhi jaruri hai,bina roye toh Maa bhi dudh nahi pilati.

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  9. एक बहुत ही बढिया व विचारणीय पोस्ट है...बहुदा ऐसा ही देखा जाता है..पिता के प्रति रूखा व्यवाहर बहुत दुखद होता है...

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  10. पिता का स्वरूप बाहर से शान्त अवश्य रहे पर उसके अन्दर भी भावों का प्रवाह रहता है।

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  11. पिता को इस बात का अहसास होता है कि बच्चे के साथ कब नरम हो और कब सख्त |उसका अपमान करना अपना स्वयं का अपमान है |जो अपने बड़ों का सम्मान नहीं करता वह पशु सामान है |अच्छा आर्टिकल |
    आशा

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  12. आपका कहना अत्यंत सत्य हैं पर जैसे की हमारी पांचों उंगली बराबर नहीं होती वैसे ही हर पिता एक समान नहीं होता ।

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  13. गहन भावों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति ...आभार

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  14. ‘‘ना करें अपने पिता का अपमान , भला हो या बुरा , पिता तो पिता ही होता है , उसका दर्द भी समझें.’’


    सही कहा....
    बहुत ही सार्थक लेख.....

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  15. बेहद सार्थक आलेख. एक अलग पहलू सामने रखने के लिये बधाई.

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