Wednesday, April 27, 2011

गब्बरसिंग और विदेश में जमा कालाधन ....>>> संजय कुमार



" कितने आदमी थे " तेरा क्या होगा कालिया " पचास -पचास कोस दूर जब बच्चा रोता है तो " माँ " कहती है बेटा सो जा वर्ना गब्बर आ जायेगा " ये डायलौग आज भी इतने मशहूर हैं जितने की आज से ३५-३६ साल पहले ! आज मैं आपको आज २०११ के गब्बर से मिलवाना चाहता हूँ ! मिलिए गब्बर सिंग और साम्भा से ! गब्बर सिंग अब बूढ़ा हो चुका है , उसके शरीर में अब कडकडाती हड्डियों के अलावा कुछ भी नहीं बचा है ! " साम्भा " सहित सभी डाकू भी बूढ़े हो चुके हैं ! आज डाकुओं के गिरोह में कुछ ज्यादा ही हलचल दिख रही है ! कुछ डाकू " माँ काली " की मूर्ति की साफ -सफाई में लगे हुए हैं ! और कुछ डाकू आपस में बात कर रहे हैं " लगता है आज अपना सरदार कुछ करने वाला हैं , लगता है आज सरदार अपने माथे पर खून का टीका जरुर लगायेंगे और आज इस बीहड़ से बहार जरुर निकलेंगे " ! तभी एक अखबार की कतरन कहीं से गब्बर के हाँथ लग जाती है और उसे पढ़ता है और पढ़कर गब्बर कुछ सोचता है और गब्बर की आवाज आती है " अरे ओ साम्भा ये विदेश कहाँ है रे और ये काला धन क्या होता है रे पूरा अखबार कालाधन से भरा पड़ा है " आज हम यहीं डांका डालेंगे , तुम घोड़ों को तैयार करो " तभी चट्टान पर बैठा साम्भा जो हमेशा निगरानी में व्यस्त रहता है ! बोल पड़ा " लगता है अपुन का सरदार पगला गया है जो ऐसी बात कर रहा है " अरे सरदार तुम्हें क्या लगता है विदेश कोई पच्चीस- तीस कोस दूर है जो अपने मरियल से घोड़ों से वहां तुरंत पहुँच जाओगे " अरे विदेश का मतलब है सात समंदर पार वहां ऐसे ही कोई नहीं जा सकता ये कोई " रामगढ़ " नहीं है की मुंह उठाकर कभी भी चले गए " वहां जाने के लिए पासपोर्ट लगता है ! और ये कालाधन जानते भी हो कि क्या होता है ? और ये कालाधन किसी साहूकार कि तिजोरी में पड़ा हुआ धन नहीं है ! जब चाहा लूट लाये ! तुम्हें मालूम भी है आज ये पूरा देश और देश कि सभी पार्टिया मंत्री-संत्री सब उसको लाने के लिए पता नहीं क्या क्या कर रहे हैं और तुम कह रहे हो कि उसे लूट लायें ! आम आदमी की जेब से निकला हुआ मेहनत और खून-पसीना बहाकर कमाया गया धन है ! जिसे देश चलाने वाले भ्रष्ट नेताओं ने देश कि जनता से लूटकर अपने - अपने खातों में जमा कर रखा है ! ये कालाधन तो लूटा हुआ ही है जो वहां की चोरों की बैंक मतलब " सुस बैंक " में जमा है .... समझे ! " क्या कहा सात समंदर पार " बहुत नाइंसाफी है रे " इन हरामजादों को इतनी दूर जाने की क्या जरुरत क्या थी ? हमारे यहाँ के बैंक बंद हो गए हैं क्या ? लगता है गब्बर के डर से यहाँ नहीं रखते ! तभी साम्भा बोला " नहीं सरदार अब इस देश में तुम डाकुओं से कोई नहीं डरता अब इस देश में तुमसे भी बड़े-बड़े डाकू , आतंकवादी , भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज पैदा हो गए हैं ! " गब्बर के ताप से तो एक बार आदमी बच भी जायेगा सरदार लेकिन देश में रह रहे देश को चला रहे सफेदपोश डाकुओं से कोई नहीं बच सकता, ये एक बार में ही इतना बड़ा डांका डालते है जितना तुम सात जनम लेने के बाद भी नहीं डाल पाओगे समझे " मालूम है कितना माल पड़ा है वहां ७००००००००००००००००००० कितनी बिंदियाँ लगी हैं इन्हें गिनते गिनते कई जनम लग जायेंगे सरदार ! इन सफेदपोश चोरों ने देश का कितना माल विदेशों में पहुंचा दिया है और आज भी पहुंचा रहे हैं ! और हम कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं हम तो एक एक रूपए के लिए मोहताज हैं ! तभी गब्बर बोलता है ! " कितना इनाम रख्हे है सरकार हम पर , पूरे 50000 " साम्भा बोला " सरदार ये भी कोई इनाम है इससे दस गुना ज्यादा की कमाई तो कोई भी चुटकी बजा कर कर लेता है ! अब घोड़ों पर बैठकर डांका डालने वाले डाकुओं का ज़माना लद गया अब तो बड़े - बड़े डाकू तो अपनी " बुलेट प्रूफ " गाड़ियों में बैठकर सफ़र करते हैं वो भी कमांडो से घिरे हुए ! गब्बर कहता है " हम तो सोच रहे थे की हमसे बड़ा और कोई डाकू है ही नहीं लेकिन मैं तो गलत निकला ! " अरे साम्भा क्या कोई नहीं है इस देश में जो इन डाकुओं को ऐसा करने से रोके और इस देश का धन बापस लाये , क्या सब के सब चोर हैं ?! साम्भा बोला " अरे नहीं सरदार आज के समय में इस देश में ईमानदारों की कमी है ! लेकिन इन सब में एक बात बहुत अच्छी है ये सब के सब देश का धन मिलबांटकर खाते हैं ! सब के सब "एक ही थैली के चट्टे -बट्टे " हैं ! इतना सुनकर गब्बर चिल्लाता है " अरे ओ साम्भा तुमने जो इस देश की हालत बताई है उसे सुनकर " सरदार क्या खुश होगा " आज सरदार खुश नहीं बहुत दुखी हुआ है ! आज इस देश को ये जो दिन देखना पड़ रहा है वो सफेदपोशों की वजह से देखना पड़ रहा है ! हम डाकू तो किसी मजबूरी वश डाका डालते हैं , हम तो किसी ना किसी के द्वारा सताए हुए होते हैं , हमारा तो हर बार दमन होता है हमें तो हर बार कुचला जाता है , तब हम जाकर मजबूरी वश वदला लेने कहीं हथियार उठाते हैं , और आम जनता का लूटा हुआ धन साहूकारों कि तिजोरी से लूटते हैं ! हम तो डाकू कहलाते हैं और हमारा अंत क्या होता है ? बस एक गोली और इस दुनिया से विदा, किन्तु आज तो बड़े - बड़े सफेदपोशों को डाकू कहना गलत नहीं होगा ! आज अगर मैं इन सफेदपोशों द्वारा लूटा हुआ धन लूटकर विदेश लाता हूँ तो आप मुझे क्या कहेंगे ?


धन्यवाद

11 comments:

  1. achchha likha hai sanjay ji aapne.

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  2. बहुत सुन्दर लिखा है संजय भाई !

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  3. वाह..क्या खूब लिखा है आपने।

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  4. यह गब्‍बर सिंह है या मनमोहन सिंह, जिसे अपने आसपास का कुछ नही मालूम और उसके चेलों को सबकुछ मालूम है।

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  5. aaj to bahut hi shaandaar raha.. badhaai.. udhar nanihaal me doosri baat ki bhee.. :)

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  6. कला धन इन सफ़ेद डाकुओं के किस काम का? इन सब के नीद उडी हुई है और इनकी उम्र कब्र मे जाने की हो गई है. जो कांग्रेस ये तमाशा देख रही है उसको आपने बजूद के लिए एक बार हार जाने पर इन सफ़ेद डाकुओं को लात मारकर अपने से जुदा करना पड़ेगा. और बीजेपी का तो भगवान् याने की राम भी मालिक नहीं रहा.

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