Sunday, December 5, 2010

करो होंसले बुलंद ....>>> संजय कुमार

फूल बनने से पूर्व ही
बिखर जातीं हैं कलियाँ ,
मिल जाते हैं रावण
हर घर , हर गलियां
ना जाने कितनी लड़कियों को
पलकों से ढँक आँखें ,
रोते देख लो ,
झेंपती, उस मासूम को
माँ की गोद में लिपटी
सिसकती देख लो !
झूठी इज्जत की चादर से
घर को क्यों ढंकती हो ?
अन्यायी , निर्दयी समाज से
क्यों डरती हो ?
विश्वास और सुरक्षा ही
छीन ली गयी हो तब
क्या खोने से डरती हो ?
करो संचय अपने में
नयी शक्ति का ,
करो होंसले बुलंद , आवाज बुलंद
करो विरोध इसका !
राम नहीं आयेंगे ,
है इन्तजार बेकार
करना होगा तुम्हें ही
रावण का संहार !
तब ही बच पाएंगी
बगीचे की कलियाँ ,
बन पाएंगी सुगंध बिखेरती
फूल तारो ताजा

करो होंसले बुलंद .............. करो होंसले बुलंद

( प्रिये पत्नी की कलम से )

धन्यवाद

9 comments:

  1. अच्छी और प्रेरणादायक रचना ...

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  2. फूल बनने से पूर्व ही
    बिखर जातीं हैं कलियाँ ,
    मिल जाते हैं रावण
    हर घर , हर गलियां
    सही कहा ,,,हालत बहुत नाजुक हैं ...बहुत बढ़िया ..शुक्रिया

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010
    को छपी है ....
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

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  4. आपकी रचना मंगलवार 07-12 -2010 चर्चा मंच पर छपी है....कविता बहुत सुन्दर और भावपूर्ण है। बधाई।

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  5. सुन्दर आह्वान

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  6. खूब ..... बहुत भावपूर्ण रचना ....सार्थक आह्वान लिए

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  7. ek vidrohi kavita ke srijan ke liye meri pratibhashali bahin Rani ko badhaai aur aapka aabhar Sanjay ji.. pata nahin usko lucky kahoon ya aapko??? :)

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