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Saturday, September 3, 2011

लोग मुझे नास्तिक कहते हैं ....>>>> संजय कुमार

मैं नास्तिक हूँ लोग कहते हैं
हाँ , अगर आडम्बर के बोझिल गहनों से

अपने और परमपिता
के प्रेम को ना सजाना नास्तिक होना है
तो मुझे ये पहचान कुबूल है ,
क्योंकि कोई भी शब्द
घ्रणा या प्रेम का का पात्र ,
नहीं होता
उस शब्द के प्रति भाव का निर्धारण तो
हम करते हैं जैसे " हाय ये चाँद "
अब इस वाक्य में आह भी है और ओह भी
ऐसे ही कोई प्रभु को आडंबरों के साथ अपनाता
और कोई आडम्बर के बिना
मैं नास्तिक अपने पिता से
मूक वार्ता करती हूँ
जब कोई सवाल मुझे परेशान कर देता है
तो पिता से ही
उसका जबाब देने को , कहती हूँ
और कोई यकीन करे ना करे
मेरे पिता प्रत्यक्ष जबाब देते हैं
पर अप्रत्यक्ष और मूक रहकर
एक बार पूरी श्रद्धा से
विना आडम्बर के
आप भी करके देखिये
यकीन हो जायेगा

( प्रिये पत्नि गार्गी की कलम से )

धन्यवाद