डोली में बैठ , जाने बाली
कब तक अर्थी में निकलेंगी
माँ तेरे दिए संस्कारों को हम
कब तक गले का फंदा बन पहनेंगी !
इन्सान कम , सामान अधिक
समझे जाते हैं , हम यहाँ
शालीनता हमारी बेवकूफी
हक मांगे तो बद्तमीजी
चुप रहें तो गलत कहलाते हैं
कुछ कहें तो उद्दंड बतलाये जाते हैं !
छोड़कर अपना सब कुछ
हम आये यहाँ
फिर भी पराये माने जाते हैं !
मायका कहता , घर ससुराल तुम्हारा है !
ससुराल कहे , मायका घर तुम्हारा है !
देकर रिश्ते , वारिस
और करके त्याग हम
उम्र भर
एक घर भी नहीं जुटा पाते हम !
( प्रिये पत्नी की कलम से )
धन्यवाद