हे पिता अनुभूति शक्ति
मैं अचेत
लडखडा रहे है मेरे पैर
आकर थाम लो हाँथ
अशांति , बैचैनी
और हताशा है छायी
अँधेरे के सिवा
और कोई नहीं है
पास मेरे
आके पिता
दो मुझको
प्रकाश , प्रेम का आधार
पाने को तेरा प्रत्यक्ष वात्सल्य
कब से लालायित है
मेरा मन
इसी इक्षा के सहारे ही
शायद अभी तक जीवित है
मेरा अंतर मन !
( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )
धन्यवाद