Monday, October 21, 2013
Wednesday, August 14, 2013
आजादी का जश्न मनाने से पहले , चलो मन से आजाद हो लें ( स्वतंत्रता दिवस ) ……>>>> संजय कुमार
हमारा देश अपनी आजादी के ६६ साल पूरे कर रहा है ! लेकिन आज़ादी के ६६ साल बाद भी हम आज़ाद होते हुए भी कहीं ना कहीं गुलामी की मानसिकता में जकड़े हुए हैं ! आज भी ढेर सारी रूढ़ीवादी परमपराओं से हमारा देश उबर नहीं पाया है ! आज भी आज़ादी को लेकर हमारे मन में प्रश्न उठता है कि .... क्या हम आज़ाद हैं .....? जबाब हाँ भी है और ना भी जो लोग हाँ में जबाब देते हैं उनका कहना है .... हमारे देश को आजाद हुए ६६ बर्ष पूरे हो चुके हैं इन ६६ बर्षों में हम भारतवासियों ने सही मायने में आजादी का मतलब समझा और जाना है ! एक आजाद इंसान वो सब कुछ कर सकता है जो एक आम आदमी गुलाम होकर नहीं कर सकता हमारे देश ने इन ६६ बर्षों में बहुत तरक्की की है और आज भी विकास की ओर अग्रसर है ! आज भारत का नाम विश्व स्तर पर छाया हुआ है जिसे देख कर आज हर भारतीय अपने आप पर गर्व महसूस करता है ! पहले हमारी गिनती गुलाम और पिछड़े हुए देशों में आती थी किन्तु आज़ादी के बाद आज ऐसा नहीं है ! आज हमारा वर्चस्व हर क्षेत्र में है ! आज हमारा लोहा विश्व के कई देशों ने माना है ! हम हर क्षेत्र में उपलब्धियां हांसिल कर रहे हैं ! विज्ञानं , खेल , तकनीकी , शिक्षा आदि में भारतियों ने सफलता के झंडे गाड़े हैं !
सच कहूँ तो हम कहने को तो आजाद हैं , किन्तु मन से आजाद नहीं हैं ! कहीं ना कहीं हम आज भी गुलाम हैं ! कुछ हालात से मजबूर , कुछ गरीबी से , कुछ पुरानी रूढ़िवादी प्रथाओं की जंजीरों में जकड़े हुए हैं ! आज देश के जो हालात हैं यहाँ जीवन यापन करने वाले लाखों - करोड़ों लोगों की जो हालत है उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि, ये लोग तो आज तक आजाद ही नहीं हुए हैं और इनकी हालत तो आज गुलामों से भी बदतर है ! इससे तो ऐसे लोग अंग्रेजों की गुलामी में ज्यादा अच्छे थे , कम से कम एक बात तो अच्छी थी कि। हमारे पैरों में गुलामी की बेड़ियाँ किसी दुश्मन ने डाल रखीं थीं , हम आशांवित थे कि , इस गुलामी से कभी ना कभी आजादी तो मिलेगी , किन्तु आज दुश्मन से ज्यादा बुरा सुलूक तो हमारे अपने हम से कर रहे हैं ! किन्तु हमें इन अपनों से आजादी कौन दिलाएगा ! आज भारत में आजादी के इतने बर्षों बाद भी लाखों मजदूर गुलामों से भी बदतर ( बंधुआ मजदूर ) सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं ! साहूकारी , खाप - पंचायत , ऊँच -नीच का भाव , जातिवाद , दहेज़ , विकृत मानसिकता जैसी कुरीतियाँ जिनसे हम अभी तक आजाद नहीं हो पाए हैं ! आखिर हमें इनसे कब मिलेगी आजादी ? हम कुछ जरुरत से ज्यादा आजाद हो गए और आजाद होकर हमने आजादी का गलत फायदा उठाया , फिर चाहे वो हमारी बिगड़ी हुई लापरवाह और लक्ष्य से भटकी हुई , अपने घटिया कारनामों से माँ - बाप का और इंसानियत का सिर शर्म से झुकाने वाली युवा पीढ़ी हो , फिर चाहे देश के नामी- गिरामी राजनीतिज्ञ हों , आला अधिकारी हों , साधू -संत हों जिन्होंने आजाद देश को पूरी आज़ादी के साथ दुश्मनों की तरह लूटा ! सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होना ही असली आज़ादी नहीं हैं ! आज देश के बुरे हालातों से हम सब बुरी तरह घिरे हुए हैं आखिर उनसे आज़ादी कब मिलेगी ? दिन - प्रतिदिन बढ़ती हुई महंगाई से कब मिलेगी आज़ादी ? दिन-प्रतिदिन बढ़ते पाप-अत्याचार , जुल्मों-सितम से कब मिलेगी आज़ादी ? पूरा देश बेईमानों , घूसखोरों , घोटालेबाजों , भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसा हुआ है .. कब मिलेगी इनसे आज़ादी ? अजन्मी बच्चियों , निर्दोष मासूमों , दहेज़ के लिए जलाई गयी बेटियों के कातिलों से कब मिलेगी आज़ादी ? मासूम बच्चों को मिड डे -मील जैसे हादसों से कब मिलेगी आजादी ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका जबाब शायद हम सभी के पास है और जबाब शायद ना में है ! फिर भी हम पूरी तरह से आजाद हैं अपनी बात रखने के लिए ! अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए ! अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए ! आजादी का सही मतलब क्या है ? ये हमें जानना होगा ! एक दिन का जश्न मनाने से कुछ नहीं होगा ! हमें अपने मन से भी आजाद होना होगा ! जो इंसानियत , भाईचारे , प्रेम - एकता से भरा हुआ हो !
आप सभी साथियों एवं समस्त देशवासियों को " स्वतंत्रता दिवस " की ढेर सारी बधाइयाँ और शुभ-कामनाएं देता हूँ !
आइये हम सब अपने मन में उठने वाले नकारात्मक विचारों से आजाद होकर इस पर्व को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएं !
जय हिन्द …… वन्दे मातरम् ……… …… इन्कलाब जिन्दाबाद …… जय हिन्द
धन्यवाद
सच कहूँ तो हम कहने को तो आजाद हैं , किन्तु मन से आजाद नहीं हैं ! कहीं ना कहीं हम आज भी गुलाम हैं ! कुछ हालात से मजबूर , कुछ गरीबी से , कुछ पुरानी रूढ़िवादी प्रथाओं की जंजीरों में जकड़े हुए हैं ! आज देश के जो हालात हैं यहाँ जीवन यापन करने वाले लाखों - करोड़ों लोगों की जो हालत है उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि, ये लोग तो आज तक आजाद ही नहीं हुए हैं और इनकी हालत तो आज गुलामों से भी बदतर है ! इससे तो ऐसे लोग अंग्रेजों की गुलामी में ज्यादा अच्छे थे , कम से कम एक बात तो अच्छी थी कि। हमारे पैरों में गुलामी की बेड़ियाँ किसी दुश्मन ने डाल रखीं थीं , हम आशांवित थे कि , इस गुलामी से कभी ना कभी आजादी तो मिलेगी , किन्तु आज दुश्मन से ज्यादा बुरा सुलूक तो हमारे अपने हम से कर रहे हैं ! किन्तु हमें इन अपनों से आजादी कौन दिलाएगा ! आज भारत में आजादी के इतने बर्षों बाद भी लाखों मजदूर गुलामों से भी बदतर ( बंधुआ मजदूर ) सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं ! साहूकारी , खाप - पंचायत , ऊँच -नीच का भाव , जातिवाद , दहेज़ , विकृत मानसिकता जैसी कुरीतियाँ जिनसे हम अभी तक आजाद नहीं हो पाए हैं ! आखिर हमें इनसे कब मिलेगी आजादी ? हम कुछ जरुरत से ज्यादा आजाद हो गए और आजाद होकर हमने आजादी का गलत फायदा उठाया , फिर चाहे वो हमारी बिगड़ी हुई लापरवाह और लक्ष्य से भटकी हुई , अपने घटिया कारनामों से माँ - बाप का और इंसानियत का सिर शर्म से झुकाने वाली युवा पीढ़ी हो , फिर चाहे देश के नामी- गिरामी राजनीतिज्ञ हों , आला अधिकारी हों , साधू -संत हों जिन्होंने आजाद देश को पूरी आज़ादी के साथ दुश्मनों की तरह लूटा ! सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होना ही असली आज़ादी नहीं हैं ! आज देश के बुरे हालातों से हम सब बुरी तरह घिरे हुए हैं आखिर उनसे आज़ादी कब मिलेगी ? दिन - प्रतिदिन बढ़ती हुई महंगाई से कब मिलेगी आज़ादी ? दिन-प्रतिदिन बढ़ते पाप-अत्याचार , जुल्मों-सितम से कब मिलेगी आज़ादी ? पूरा देश बेईमानों , घूसखोरों , घोटालेबाजों , भ्रष्टाचारियों के चंगुल में फंसा हुआ है .. कब मिलेगी इनसे आज़ादी ? अजन्मी बच्चियों , निर्दोष मासूमों , दहेज़ के लिए जलाई गयी बेटियों के कातिलों से कब मिलेगी आज़ादी ? मासूम बच्चों को मिड डे -मील जैसे हादसों से कब मिलेगी आजादी ? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका जबाब शायद हम सभी के पास है और जबाब शायद ना में है ! फिर भी हम पूरी तरह से आजाद हैं अपनी बात रखने के लिए ! अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए ! अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए ! आजादी का सही मतलब क्या है ? ये हमें जानना होगा ! एक दिन का जश्न मनाने से कुछ नहीं होगा ! हमें अपने मन से भी आजाद होना होगा ! जो इंसानियत , भाईचारे , प्रेम - एकता से भरा हुआ हो !
आप सभी साथियों एवं समस्त देशवासियों को " स्वतंत्रता दिवस " की ढेर सारी बधाइयाँ और शुभ-कामनाएं देता हूँ !
आइये हम सब अपने मन में उठने वाले नकारात्मक विचारों से आजाद होकर इस पर्व को ख़ुशी- ख़ुशी मनाएं !
जय हिन्द …… वन्दे मातरम् ……… …… इन्कलाब जिन्दाबाद …… जय हिन्द
धन्यवाद
Wednesday, July 3, 2013
क्षति ............. >>>>> गार्गी की कलम से
पेड़ पर चली कुल्हाड़ी
पैरों पर पड़ गई
खुशियाँ मातम में
वदल गई
गलती तो हुई
और उसकी
सजा भी मिली
जो भावात्मक " क्षति " हुई
उसकी पूर्ती क्या
संभव है .....?
नहीं !
अगर हम
अब भी ना चेते
तो शायद
संभलने का
दूसरा मौका ना मिले ......
( गार्गी की कलम से )
धन्यवाद
Wednesday, May 15, 2013
टूटी हुई माला को अब जोड़ना होगा .....( परिवार -दिवस ) .......>>>> संजय कुमार
एक - एक मोती चुनकर , एक ही धागे में कई मोतियों को पिरोकर बनाई जाती है माला ! माला फूलों की होती है ! हीरे - जवाहरात , नग , सोने - चाँदी और भी कई प्रकार की होती है ! जब माला किसी के गले में पहनाई जाती है तो पहनने वाले का महत्त्व और भी ज्यादा बड़ जाता है ! सच तो ये है कि , माला उन्हीं के गले में डाली जाती है जो उसके असली हक़दार होते हैं ! खैर ये तो मालाओं की व्याख्या है ! किन्तु मैं जिस माला की बात कर रहा हूँ उसका तात्पर्य हम सभी से है और वो मोतियों की माला हमारा संयुक्त परिवार है ! एक माला जिस तरह अपने में सभी मोतियों को पिरोकर रखती है ठीक उसी प्रकार एक संयुक्त परिवार अपने परिवार के सभी सदस्यों को एक माला के रूप में बाँध कर रखता है ! एक मजबूत माला वही होती है जिसका धागा मजबूत होता है अर्थात माला रुपी परिवार के सभी सदस्य जिनके अन्दर संस्कार , अपनापन , एक-दुसरे के प्रति प्रेम का भाव आदि होते हैं , और ये सब कुछ एक संयुक्त परिवार में ही हो सकता है ! क्योंकि हम एक संयुक्त परिवार में रहकर ही नियंत्रित होते हैं ! एकल परिवार प्रणाली में हमारे ऊपर नियंत्रण का आभाव होता है जिससे कई समस्याएं हमारे सामने उत्पन्न होती रहती हैं ! सभी सदस्यों का आपस में एक - दुसरे के प्रति मान- सम्मान , आदर , संस्कार , एक -दुसरे के प्रति प्रेम का भाव और अपनापन जहाँ ये सभी चीजें एक साथ उपस्थित होती हैं, तो उस जगह को हम एक परिवार कहते हैं , हँसता -खेलता परिवार ! आज के दूषित माहौल में समाज का सर्वश्रेष्ठ परिवार ! सच तो ये है हमारी एकता में जो शक्ति है वो शायद किसी अकेले इंसान में नहीं है ! अकेला इंसान आज के समय में कुछ भी नहीं है और यह बात बिलकुल सही है ! क्योंकि हम जानते हैं एकता और संगठन की शक्ति को ! जब हम संगठन की ताकत से भली-भांति परिचित हैं तो फिर क्यों हमारा पारिवारिक संगठन टूट रहा है ! आज के आधुनिक युग ने हमें भले ही बहुत कुछ दिया हो फिर भी हमने आधुनिक बनने की होड़ में बहुत कुछ खोया है ! आप भी इस बात से सहमत होंगे ......
एक समय था जब हम किसी के घर जाते थे तो वहां पर हमारी मुलाकात परिवार के सभी सदस्यों से होती थी तो मन को एक अनूठी सी ख़ुशी मिलती थी मन प्रसन्न हो जाता था ! घर में दादाजी -दादीजी, माता -पिता , चाचा-चाची, भैया-भाभी, और भी कई रिश्ते जिनसे एक घर सम्पूर्ण परिवार बनता है ! ( आज मुमकिन नहीं लगता आज हमारे पास घर हैं किन्तु परिवार नहीं ) पर जैसे जैसे समय बीत रहा है ! जब से इन्सान अपने आप से मतलब रखने लगा है सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है जबसे उसने परिवार के बारे में सोचना छोड़ दिया है तब ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्यों का एक - दुसरे के प्रति अपनेपन का भाव खत्म होने लगता है और शुरुआत हो जाती है एक संयुक्त परिवार रुपी माला के टूटने की ! जब अपनापन खत्म होता है तो पारिवारिक एकता में विघटन और वदलाव होने लगता है ! कारण एक -दो नहीं कई हैं और सबसे बड़ा कारण हमारा अपने ऊपर नियंत्रण का ना होना , सब्र की कमी , बात - बात पर अपना आपा खो देना जिस कारण से आये दिन घर- परिवार में लड़ाई - झगडे की स्थिति बनी रहती है ! आये दिन होने वाले इन्हीं झगड़ों के कारण अपनों से अपने परिवार से दूर हो रहा है ! इन्हीं बातों को लेकर परिवारों के बीच दीवार खींच जाती है ! ऐसी स्थिति में एक बड़ा सा परिवार बदल जाता है चिड़ियों के घोंसलों जैसा और जब एक बार अपनों के बीच दीवार खिंच जाती है तो फिर हमारा परिवार , परिवार नहीं कहलाता ईंटों की चार दीवारी से बना घर कहलाता है और बन जाता है ईंट पत्थर से निर्मित एक मकान ! आज इस विघटन और वदलाव से हमारा कितना अहित हो रहा है , शायद हम ये बात बहुत अच्छे से जानते है लेकिन जानकर भी अनजान हैं ! इसका असर आज हम देख रहे हैं सुन रहे हैं ! अपने बच्चों से दूर होते संस्कार के रूप में , दूर होती रिश्तों की महक , खत्म होती अपनत्व की भावना और प्रेम , एक-दुसरे का मान-सम्मान करने का भाव और ये सब कुछ हो रहा है परिवार के बंटने से ! जब से हम वदले तब से वदल गयी हमारे घर- परिवार की कहानी और ये कहानी आज की है ! आज ये कहानी " घर - घर की कहानी " है !
हम सभी को ईंट - पत्थर से बने मकानों से निकलकर अपने घर - परिवार में वापस आना होगा या फिर हमें फिर से अपने परिवार जो जोड़कर एक सम्पूर्ण परिवार बनाना होगा ! यदि हमारे अन्दर परिवार के किसी सदस्य के प्रति मन में नाराजगी है तो आपस में बैठकर उसे दूर करना होगी अन्यथा ये परिवार विघटन रुपी खाई और गहरी ...... गहरी होती जाएगी ........ क्या हम इस पर विचार कर सकते हैं ......? क्या हम आगे बढ़कर टूटे हुए परिवार को जोड़ सकते हैं ! अब हमें पुनः माला में मोती पिरोकर टूटी हुई माला को जोड़ना होगा
धन्यवाद
एक समय था जब हम किसी के घर जाते थे तो वहां पर हमारी मुलाकात परिवार के सभी सदस्यों से होती थी तो मन को एक अनूठी सी ख़ुशी मिलती थी मन प्रसन्न हो जाता था ! घर में दादाजी -दादीजी, माता -पिता , चाचा-चाची, भैया-भाभी, और भी कई रिश्ते जिनसे एक घर सम्पूर्ण परिवार बनता है ! ( आज मुमकिन नहीं लगता आज हमारे पास घर हैं किन्तु परिवार नहीं ) पर जैसे जैसे समय बीत रहा है ! जब से इन्सान अपने आप से मतलब रखने लगा है सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है जबसे उसने परिवार के बारे में सोचना छोड़ दिया है तब ऐसी स्थिति में परिवार के सदस्यों का एक - दुसरे के प्रति अपनेपन का भाव खत्म होने लगता है और शुरुआत हो जाती है एक संयुक्त परिवार रुपी माला के टूटने की ! जब अपनापन खत्म होता है तो पारिवारिक एकता में विघटन और वदलाव होने लगता है ! कारण एक -दो नहीं कई हैं और सबसे बड़ा कारण हमारा अपने ऊपर नियंत्रण का ना होना , सब्र की कमी , बात - बात पर अपना आपा खो देना जिस कारण से आये दिन घर- परिवार में लड़ाई - झगडे की स्थिति बनी रहती है ! आये दिन होने वाले इन्हीं झगड़ों के कारण अपनों से अपने परिवार से दूर हो रहा है ! इन्हीं बातों को लेकर परिवारों के बीच दीवार खींच जाती है ! ऐसी स्थिति में एक बड़ा सा परिवार बदल जाता है चिड़ियों के घोंसलों जैसा और जब एक बार अपनों के बीच दीवार खिंच जाती है तो फिर हमारा परिवार , परिवार नहीं कहलाता ईंटों की चार दीवारी से बना घर कहलाता है और बन जाता है ईंट पत्थर से निर्मित एक मकान ! आज इस विघटन और वदलाव से हमारा कितना अहित हो रहा है , शायद हम ये बात बहुत अच्छे से जानते है लेकिन जानकर भी अनजान हैं ! इसका असर आज हम देख रहे हैं सुन रहे हैं ! अपने बच्चों से दूर होते संस्कार के रूप में , दूर होती रिश्तों की महक , खत्म होती अपनत्व की भावना और प्रेम , एक-दुसरे का मान-सम्मान करने का भाव और ये सब कुछ हो रहा है परिवार के बंटने से ! जब से हम वदले तब से वदल गयी हमारे घर- परिवार की कहानी और ये कहानी आज की है ! आज ये कहानी " घर - घर की कहानी " है !
हम सभी को ईंट - पत्थर से बने मकानों से निकलकर अपने घर - परिवार में वापस आना होगा या फिर हमें फिर से अपने परिवार जो जोड़कर एक सम्पूर्ण परिवार बनाना होगा ! यदि हमारे अन्दर परिवार के किसी सदस्य के प्रति मन में नाराजगी है तो आपस में बैठकर उसे दूर करना होगी अन्यथा ये परिवार विघटन रुपी खाई और गहरी ...... गहरी होती जाएगी ........ क्या हम इस पर विचार कर सकते हैं ......? क्या हम आगे बढ़कर टूटे हुए परिवार को जोड़ सकते हैं ! अब हमें पुनः माला में मोती पिरोकर टूटी हुई माला को जोड़ना होगा
धन्यवाद
Sunday, May 12, 2013
तलाश जारी है ...( मदर्स - डे Mother's Day ) ........>>> गार्गी की कलम से
आपकी हर वेदना
मेरी संवेदना हो गई
आपकी जिंदगी
मेरे लिए सबक हो गई
कौन कहता है कि ,
" खुशियाँ "
आती जाती रहती हैं
आपके करीब थे जब तक
सुकून ना खोया था
दूर होकर आपसे
खुशियाँ भी बिना सुकून हो गई ,
पा कर भी जिंदगी का
हर एक सुख
लगता है कभी - कभी
जैसे सब कुछ खो दिया है !
मेरे जीवन में
निःस्वार्थ प्रेम और
विश्वास की परिभाषा
आप हो मेरे लिए
आपको हर किसी में
खोजती हूँ
तलाश जारी है अभी , ............ " माँ "
( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )
धन्यवाद
मेरी संवेदना हो गई
आपकी जिंदगी
मेरे लिए सबक हो गई
कौन कहता है कि ,
" खुशियाँ "
आती जाती रहती हैं
आपके करीब थे जब तक
सुकून ना खोया था
दूर होकर आपसे
खुशियाँ भी बिना सुकून हो गई ,
पा कर भी जिंदगी का
हर एक सुख
लगता है कभी - कभी
जैसे सब कुछ खो दिया है !
मेरे जीवन में
निःस्वार्थ प्रेम और
विश्वास की परिभाषा
आप हो मेरे लिए
आपको हर किसी में
खोजती हूँ
तलाश जारी है अभी , ............ " माँ "
( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )
धन्यवाद
Friday, April 26, 2013
गरीबी का जहर और बाल श्रम .......>>> गार्गी की कलम से
मैंने अपने बेटे को देखा
प्लेटफ़ॉर्म पर हाँथ फैलाते हुए
ढावों पर चाय - पानी देते हुए
गलियों में कचरा बीनते हुए
खाने - पीने की चीजें चोरी करने पर
पब्लिक से मार खाते हुए ........
यूँ तो मेरा बेटा
अच्छे स्कूल में पढ़ता है
अच्छा खाता है
पहनता है
खेलता है !
उसे वो सब मिलता है
जो उसे मिलना चाहिए
वो उसका हक है !
पर जब भी मैं , किसी
बेबस , लाचार
बच्चे को देखती हूँ
तो उसमें मुझे
अपने बेटे का
चेहरा नज़र आता है !
" बाल श्रम " अपराध है
ऐसा कह देने से,
कानून बन जाने से
अपराध रुका नहीं
क्योंकि समाज और देश का
सिस्टम नहीं बदला
जब तक सिस्टम नहीं बदलेगा
गरीबी का जहर
इस देश इस समाज में
फैला ही रहेगा , और
बचपन
दम तोड़ता ही रहेगा
( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )
धन्यवाद
प्लेटफ़ॉर्म पर हाँथ फैलाते हुए
ढावों पर चाय - पानी देते हुए
गलियों में कचरा बीनते हुए
खाने - पीने की चीजें चोरी करने पर
पब्लिक से मार खाते हुए ........
यूँ तो मेरा बेटा
अच्छे स्कूल में पढ़ता है
अच्छा खाता है
पहनता है
खेलता है !
उसे वो सब मिलता है
जो उसे मिलना चाहिए
वो उसका हक है !
पर जब भी मैं , किसी
बेबस , लाचार
बच्चे को देखती हूँ
तो उसमें मुझे
अपने बेटे का
चेहरा नज़र आता है !
" बाल श्रम " अपराध है
ऐसा कह देने से,
कानून बन जाने से
अपराध रुका नहीं
क्योंकि समाज और देश का
सिस्टम नहीं बदला
जब तक सिस्टम नहीं बदलेगा
गरीबी का जहर
इस देश इस समाज में
फैला ही रहेगा , और
बचपन
दम तोड़ता ही रहेगा
( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )
धन्यवाद
Wednesday, April 3, 2013
होनहार बच्चे और उनके माता - पिता जरा ध्यान दीजिये . ... आपकी खुशियों का सवाल है ....>>> संजय कुमार
अभी पिछले दो हफ्ते पहले की बात है , हमारे शहर ग्वालियर में एक नौंवी कक्षा की होनहार स्कूल छात्रा ने अपने ही पिता की बन्दूक से अपने आप को गोली मारकर आत्महत्या कर ली , इस दिल दहला देने वाली घटना को जिसने सुना दंग रह गया , आखिर क्यों उसने ऐसा किया ? जब कारण मालूम चला तो लोगों के होश उड़ गए .. कारण था उस छात्रा का परीक्षा में गणित का पेपर बिगड़ना .. क्या इतनी छोटी सी बात पर आत्महत्या कर लेना सही था ...? मैं तो कहता हूँ कि , किसी भी बात पर आत्महत्या कर लेना सबसे बड़ी बुजदिली की निशानी है ! आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है अपितु इससे अनेकों प्रश्न हमारे सामने उत्पन्न होते हैं ! फिर भी इस तरह के मामले हम हर साल सुनते और देखते हैं ! इस तरह के अनेकों मामले हमारे सामने कई बार आये हैं ! जब किसी छात्र -छात्रा ने परीक्षा में फ़ैल होने पर अपने गले में फाँसी का फंदा डालकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली ? जरा जरा सी बात पर बच्चों का इतनी जल्दी आप खो देना अपनी जान लेने की कोशिश करना .? आखिर क्यों .? क्या गुजरती होगी ऐसे माता - पिता के दिल पर जब वो अपने ही बच्चों की लाश अपने कन्धों पर ढोते होंगे , जिन कन्धों पर बैठाकर उनको उज्जवल भविष्य के सपने दिखाए ? क्या इसी दिन के लिए माता-पिता अपना पेट काटकर अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना देखते हैं ! अब इस तरह के मामलों में हम किसको दोष दें ? कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? शायद हम सभी जिम्मेदार हैं इस तरह के हादसों के लिए ! एक कारण ... माता - पिता द्वारा बच्चों पर अधिक प्रेशर का डालना कि, हर हाल में , किसी भी कीमत पर अच्छे नंबरों से पास होना ही पड़ेगा, फिर चाहे इसके लिए तुम्हें २४ घंटे ही क्यों ना पढ़ना पड़े ? हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं इत्यादि ! स्कूल का प्रेशर हमेशा होनहार बच्चों पर रहता है, क्योंकि स्कूल की रेपुटेशन का सवाल होता है जहाँ टीचर्स बच्चों पर कुछ ज्यादा ही दबाब बनाते हैं ! या फिर बच्चे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार है जो जरा जरा सी बातों पर अपनी सुध-बुध खो देते हैं ! एक दुसरे से आगे निकलने की होड़ जिसके लिए कुछ भी कर गुजरें ! सच कहूँ तो जिम्मेदार हम सभी हैं और हम सभी को इसकी जिम्मेदारी लेनी भी होगी ! क्योंकि किसी की एक गलती हमसे हमारी खुशियाँ छीन सकती हैं ! फिर भी सच तो ये है कि बच्चे तो बच्चे होते हैं उनमें बचपना भी बहुत होता है और लम्बे समय तक ये उनके साथ भी रहता है ! बच्चों में ज्ञान की कमी होती है , उन्हें सही गलत का अनुमान नहीं होता , कौन सी बात उनके मन में कब घर कर जाये इसका अनुमान हम लोग नहीं लगा सकते ! फिर भी बच्चों की उम्र के इस पड़ाव में उन्हें माता-पिता के साथ की आवश्यकता हमेशा होती है ! इस उम्र में बच्चों की सोच उनके हाव-भाव , व्यवहार में तेजी से परिवर्तन होता है ! कुछ बच्चे वक़्त के साथ ढल जाते हैं और सही गलत का अनुमान लगा लेते हैं फिर भी सभी बच्चों को उचित मार्ग-दर्शन की आवश्यकता होती है ! जब से हमने अपने आप को जरूरत से ज्यादा व्यस्त कर लिया है तब से हम लोगों का ध्यान अपने बच्चों से और उनकी दिनचर्या , क्रिया-कलाप , व्यवहार से पूरी तरह हट गया है और आज अधिकांश परिवारों में यही स्थिति है ! बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार , स्नेह , मार्ग-दर्शन , उनके लिए समय निकालना किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है ! अगर बच्चों के लिए माता-पिता के पास समय नहीं है तो इस तरह की स्थिति उनके साथ भी निर्मित हो सकती है ! खास तौर पर होनहार बच्चे इस तरह की वारदात को ज्यादा अंजाम देते हैं ! क्योंकि वो इस बात को बहुत गहराई से सोचते हैं और असफल होने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस होगी ! बस यहीं वो गलती कर जाते हैं ! माता-पिता जब बच्चों को ज्यादा होशियार समझने लगते हैं तो उनका भी ध्यान बच्चों से उनकी दिनचर्या से हट जाता है और वो बड़ी बेफिक्री महसूस करते हैं ! यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो आप अलर्ट हो जाइये !
मैं सभी होनहार बच्चों से गुजारिश करूंगा कि , हमारा जीवन बहुत ही अनमोल है और ये जीवन हमें एक बार ही मिलता है ! हमें कभी भी छोटी - छोटी असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए और छोटी - छोटी सफलता पर किसी भी तरह का घमंड नहीं करना चाहिए ! क्योंकि ये दोनों स्थिति हमारे लिए हितकर नहीं हैं ! क्योंकि जान है तो जहान है और हम जिन्दा रह कर ही इतिहास बना सकते हैं ! सभी माता - पिता से गुजारिश है , कृपया अपने बच्चों को अपना समय दीजिये और जीवन उपयोगी बातों से उन्हें अवगत करायें !
विशेष ......>> जिन घरों में नन्हें - मुन्हें बच्चें हैं उन घरों में कृपया अपनों की ही मौत का सामान ना रखें जिन्हें हम हथियार कहतें हैं क्योंकि जब गोली चलती है तो वो ये नहीं देखती की कौन अपना है कौन पराया वो सिर्फ खुशियाँ छीनती है ..... इसलिए कहता हूँ कि , ... ये सवाल आपकी अपनी खुशियों का है !
(एक छोटी से बात )
धन्यवाद
मैं सभी होनहार बच्चों से गुजारिश करूंगा कि , हमारा जीवन बहुत ही अनमोल है और ये जीवन हमें एक बार ही मिलता है ! हमें कभी भी छोटी - छोटी असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए और छोटी - छोटी सफलता पर किसी भी तरह का घमंड नहीं करना चाहिए ! क्योंकि ये दोनों स्थिति हमारे लिए हितकर नहीं हैं ! क्योंकि जान है तो जहान है और हम जिन्दा रह कर ही इतिहास बना सकते हैं ! सभी माता - पिता से गुजारिश है , कृपया अपने बच्चों को अपना समय दीजिये और जीवन उपयोगी बातों से उन्हें अवगत करायें !
विशेष ......>> जिन घरों में नन्हें - मुन्हें बच्चें हैं उन घरों में कृपया अपनों की ही मौत का सामान ना रखें जिन्हें हम हथियार कहतें हैं क्योंकि जब गोली चलती है तो वो ये नहीं देखती की कौन अपना है कौन पराया वो सिर्फ खुशियाँ छीनती है ..... इसलिए कहता हूँ कि , ... ये सवाल आपकी अपनी खुशियों का है !
(एक छोटी से बात )
धन्यवाद
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