Monday, July 9, 2012

मनाने रूठने के खेल में हम ...........>>> संजय कुमार

 इंसान का जीवन बहुत सारी कठिनाईयों से भरा पड़ा है ! सुख- दुःख , गम और खुशी , अच्छा - बुरा , प्यार- मुहब्बत,  ये वो चीजें हैं जो समय , परिस्थिति और  हालात के अनुसार इंसान के जीवन में अपना असर छोडती  हैं ! कुछ हद तक ये इंसान के वश में भी होती हैं ,फिर भी ज्यादातर इंसान इन्हीं चीजों से ज्यादा परेशान होता हैं ! आज मैं जिस बिषय पर आपसे बात कर रहा हूँ , वो है  तो  मामूली और इंसान की रोज की दिनचर्या का अहम् हिस्सा , किन्तु आजकल उसके परिणाम हमारे सामने सकारात्मक नहीं आ रहे हैं ! मैं बात कर रहा हूँ रूठने और मनाने की बात का , जो हम सभी के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है ! वैसे रूठने मनाने की कोई उम्र तो नहीं होती फिर भी  बचपन और  जवानी से लेकर बुढ़ापे तक ये खेल चलता रहता है ! बच्चों का माता-पिता से रूठना - माता-पिता द्वारा बच्चों को मनाना आम बात है ! जवानी में यार दोस्तों से रूठना मनाना , प्रेमी-प्रेमिकाओं का रूठना मनाना , पति- पत्नि का रूठना मनाना , बूढ़े माता-पिता से आज बच्चों का सिर्फ रूठना ही होता है !  आज बहुत से बच्चे अपने माता-पिता से रूठे हुए हैं तभी तो देश के कई वृधाश्रम ऐसे बुजुर्गों से भरे पड़े हैं !  सिर्फ इस इन्तजार में कि , कब ये हमसे रूठे हुए बच्चे  हमें यहाँ से अपने घर ले जाएँ ......? इंसान के जीवन में जिस तरह सुख - दुःख  का होना आवश्यक है ठीक उसी प्रकार रूठने और मनाने का भी , अगर ये सब नहीं है तो जीवन बेजान और नीरस हो जायेगा ! जैसे - जैसे देश तरक्की कर रहा है , सफलता के नए आयाम पर हम पहुँच रहे हैं ! आधुनिक साधनों का तेजी से बढ़ता प्रयोग हमारी सफलता की गवाही देता है ! हमने कई क्षेत्रों में बहुत तरक्की की है किन्तु कुछ चीजें ऐसी हैं जहाँ हम बदलते समय के साथ - साथ नहीं चल पाए  और वो है हमारी " सोच " का दायरा , जी हाँ ये सही है .... हम इसी जगह अभी भी बहुत पिछड़े हुए लोगों की श्रेणी में आते हैं ! मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि , इसी  छोटी सी सोच की वजह से आज कई परिवार बिखर गए हैं या फिर बिखरने की स्थिती में हैं ! बात- बात पर पत्नि का रूठना , बात - बात पर पति का रूठना हमारे समाज में आजकल एक फैशन सा बन गया है ! छोटी- मोटी तकरार होती है तो अच्छा है , किन्तु ये प्रतिदिन का रूठना मनाना किसी भी व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में कड़वाहट और मनमुटाव की  एक गहरी और लम्बी खाई को खोदने का काम कर रहा है , यदि जल्द इस खाई को नहीं भरा गया तो स्थिती बहुत खराब होगी ! हमने अक्सर देखा है रूठने मनाने के इस खेल को बड़े मतभेद और लड़ाइयों में तब्दील होते ! शुरुआत में तो ये सब अच्छा लगता है किन्तु जब ये रोज की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है तो ऐसे हालात में स्थिती बहुत गंभीर हो जाती है ! उस पर एक दुसरे से कई दिनों तक बात ना करना  आग में घी का काम करता है ! हालांकि ऐसा हर किसी के जीवन में नहीं होता जहाँ छोटी- मोटी तकरार कोई बड़ा रूप लेती हो , जहाँ ऐसा नहीं होता वहां पर पति-पत्नि की आपस की समझदारी बहुत काम आती है ! हर समस्या का समाधान बैठकर आपस में सलाह - मशविरा कर के कर लिया जाता है , और ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि पति - पत्नि एक दुसरे पूरक होते  हैं , एक गाड़ी के दो पहिये जो जीवन रुपी गाड़ी को आगे और अंत तक साथ ले जाते हैं ! जो व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवन में सयम और समझदारी का उपयोग नहीं करते , बात बात पर एक दुसरे को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ते उनका जीवन  साइकिल  में लगे हुए उस टायर - ट्यूब के जैसा होता है जिसमें सेकड़ों पंक्चर होती हैं ........... अंत ये होता है कि हमें टायर - ट्यूब बदलना पड़ता है ! ऐसा देखा गया है की छोटे-छोटे झगडे कभी - कभी अलगाव और तलाक की नौबत तक ला देते हैं ! और यदि ऐसा होता है तो दोनों का ही जीवन बड़ा कष्टमय गुजरता है ! ऐसा भी देखा गया है कि एक दुसरे से अलग हुए पति -पत्नि बाद  में पश्चातव में आंसू बहाते हैं  .....किन्तु  तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होती है ........  " अब पछतावे होत क्या .. जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत " 
मैं अपने सभी युवा साथियों से ये गुजारिश करूंगा की यदि आप अपने वैवाहिक जीवन में रूठने मनाने  के इस खेल को यदि रोज खेलते हैं तो कृपया इसे बंद कर दीजिये ............ कहीं ऐसा ना हो .... इस रूठने मनाने के खेल में आप एक - दूजे से हमेशा के लिए बिछड़ जाएँ ! सब्र ... संयम और समझदारी का परिचय दीजिये ......


धन्यवाद 

Thursday, July 5, 2012

सारे जग की आँखों के तारे ..... अब नहीं लगते प्यारे ......>>>> संजय कुमार

आज से ३०-४० साल पहले बच्चों को लेकर एक फ़िल्मी गीत आया था ! " बच्चे मन के सच्चे , सारे जग की आँखों के तारे , ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे " इस तरह के गानों को  हम अब कभी कभार ही सुन पाते हैं ! जब " बाल दिवस " आता है ! जब  किसी बच्चे का जन्म दिन होता है ! वर्ना आज सभी के दिलो दिमाग पर तो " शीला - मुन्नी और चमेली " और ना जाने ऐसे कितने गीत छाये हुए हैं ! हम जब भी बच्चों पर लिखे हुए गीत सुनते हैं तो हमारी आँखों के सामने बच्चों के खिलखिलाते , कोमल और मासूम चेहरे नजर आते हैं ! बच्चे किसी के भी हों बहुत मासूम होते हैं और हर कोई उन्हें बहुत प्यार करता है ! यहाँ तक की हम पशु -पक्षियों के बच्चों को भी उतना प्यार करते हैं जितना कि अपने बच्चों को ! किन्तु आज जो कुछ बच्चों के साथ हो रहा है ,  आज जो उनकी स्थिति है उसे देखकर कभी-कभी इंसान होने की आत्मग्लानी हमारे मन में अवश्य होती हैं ! हमारे सामने आज ऐसे हजारों उदहारण हैं जो इंसानियत और मानवता के लिए एक बदनुमा दाग हैं ! क्या हम इंसान ही हैं ? जो अपने बच्चों की खुशियों के लिए जीवनभर तकलीफें उठाते हैं , उन्हें एक अच्छी जिंदगी देने के लिए अब अपना सब कुछ दांव पर लगाने से भी नहीं चूकते , तो दूसरी ओर कुछ लोग अपने ही बच्चों के साथ दिल को दहलाने वाली अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं ! ऐसे कार्य जो जघन्य अपराध की श्रेणी में आते हैं , कर रहे हैं ! हमारे देश में कुछ अजन्मे बच्चों को " माँ " की कोख में ही मार डाला जाता है और इस तरह का कार्य पिता और परिवार के लोगों द्वारा ही किया जाता है ! कहीं दो साल की बच्ची के साथ बलात्कार जैसी इंसानियत और मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटनाएँ हो रही हैं ! कहीं पिता , परिवार और सगे रिश्तेदारों के द्वारा मासूम बच्चे -बच्चियां यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं ! तो कहीं माता-पिता अपना पेट भरने के लिए अपने ही मासूम बच्चे का सौदा कर उन्हें बेच रहे हैं ! कहीं बच्चों को माता-पिता के गुस्से का शिकार होना पड़ता है , कहीं माँ तो कहीं पिता बच्चों को मारकर खुदख़ुशी कर लेता है ! तो कहीं स्कूल में टीचर का दुर्व्यवहार बच्चों को सहना पड़ता है ! गरीबी से तंग आकर माता -पिता बच्चों के साथ अन्याय कर रहे हैं ! कहीं ट्रेन में कोई ६ महीने का बच्चा ( बेटी ) छोड़ जाता है , तो कोई नवजात को कचरे के ढेर पर फेंक जाता है ! आज बच्चे कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं ! चारों तरफ बच्चों का भक्षण करने वाले भेड़िये सिर उठाकर खुलेआम घूम रहे हैं ! " निठारी कांड " अरुशी मर्डर " जैसी  कई घटनाएँ बच्चों पर हुए निर्मम अत्याचार की गवाह हैं ! बच्चों पर होने वाली इन घटनाओं , उन पर होने वाले अत्याचारों को देखकर लगता है जैसे मासूम बच्चे हम इंसानों की आँख की किरकिरी बन गए हैं ! वर्ना इतना तो शायद ही बच्चों ने कभी सहा हो जितना कि पिछले १०-१५ सालों में ! ऐसा नहीं है इस तरह की घटनाएँ भारत में ही हो रही हैं बल्कि बच्चों के साथ यौन शोषण जैसी घटनाएँ विदेशों में भी कई हुई हैं कई बड़ी हस्तियों का नाम " बाल यौन शोषण " से जुड़ा रहा ! आज जो अत्याचार बच्चों के साथ हो रहे है उसे देखकर तो भगवान भी डरता होगा कि कहीं हमें इस दौर में बच्चे के रूप में जन्म ना लेना पड़ जाये ....... वर्ना पता नहीं इस रूप में हमें और क्या क्या देखना और सहना पड़ता ........ " सारे जग की आँखों के तारे ........ ( इस जग को ) अब नहीं लगते प्यारे "  और आपको .....................


धन्यवाद  

Sunday, July 1, 2012

ये भूख कब मिटेगी ? .......>>> संजय कुमार

भूख किसी भी चीज के लिए हो सकती है ! यह जरूरी नहीं की इन्सान को भूख सिर्फ पेट  भरने के लिए लगती हो ! रोटी की खूख तो इन्सान कैसे न कैसे मिटा ही लेता है ! ( वैसे भी रोटी की भूख सिर्फ गरीब को है )  लेकिन एक भूख  ऐसी भी है  जिससे इन्सान का पेट कभी नहीं भरता , और वो है  सफलता पाने की भूख ! सफलता पाने की भूख  एक ऐसी भूख  है जो कभी खत्म नहीं होती बल्कि समय के साथ साथ और भी बढ़ती जाती है ! मैं तो ये कहता हूँ कि , ये  भूख  कभी खत्म होनी भी नहीं चाहिए ,  तब तक जब तक आप सफलता  हासिल ना कर लें ! भूख अच्छी है, अगर उसका उद्देश्य किसी अच्छे लक्ष्य को पाने के लिए है , अगर भूख  ऐसी हो जिसका लक्ष्य सफलता पाना हो, वो भी गलत तरीके से  तो वह बहुत बुरी है ! क्योंकि इस तरह की  भूख  का कोई अंत नहीं है और ना कभी होगा ! जैसे जैसे समय तेजी से आगे बढता जा रहा है ! जैसे जैसे आधुनिकता का चोला हम सब को अपनी गिरफ्त में  ले रहा है , ठीक उसी प्रकार सफलता पाने का लक्ष्य भी बदलता जा रहा है ! आज हम सब  सफलता पाने के लिए बहुत कुछ करते हैं , कुछ सही और कुछ गलत , अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं ! फिर भी सफलता मिलेगी या नहीं ,कुछ नहीं कह सकते ! खैर आम आदमी की भूख सीमित है और वक़्त के साथ मिट भी जाती है ! किन्तु हमारे यहाँ ऐसे कई लोग हैं जो जन्म-जन्मान्तर के भूखे हैं ! भूखों की श्रेणी में , मैं देश के नेताओं को पहले पायदान पर रखना चाहता हूँ ! आप सभी इस बात से पूरी तरह सहमत होंगे ! सच कहूँ , मैं तो अभी भी भूखा हूँ और जब तक सफलता हांसिल नहीं कर लेता ये भूख नहीं मिटेगी !

भूख  अगर अच्छे के लिए है तो अच्छा ............अगर गलत के लिए हो तो, बहुत बुरी ............................


धन्यवाद

Saturday, June 23, 2012

" हमसे है जमाना - जमाने से हम नहीं " ......>>>> संजय कुमार

 ऐसा नहीं है कि मेरे होने से ये देश चल रहा हो , ऐसा भी नहीं है कि मेरे ना होने से ये देश नहीं चलेगा ! हमारी गिनती तो उन लोगों में होती है जो गरीबी , मंहगाई , भ्रष्टाचार , घोटाले आदि को लेकर चिल्ल पों मचाते रहते हैं , हम तो उन लोगों में से हैं जिन्होंने सरकार की नाक में दम कर रखा है ! भले ही सरकार की नजर में हम कीड़े-मकौड़े हों फिर भी .................... मुझे एक फेमस फ़िल्मी डायलॉग  याद आता है ! " हमसे है ज़माना , जमाने से हम नहीं " .......... क्योंकि हम हैं भारत के " अनमोल रत्न ", हम नहीं होंगे तो कुछ भी नहीं होगा ! हम हैं मजबूर , लाचार , हर जगह से ठुकराए  हुए इस देश के  " गरीब "  मैं यहाँ बात कर रहा हूँ हमारे देश के सबसे बड़े गहने का यानि देश के वीर, गरीबों की , ये वो  गरीब हैं जो इस देश की शान हैं और  जिनके बिना इस देश में  कुछ भी संभव नहीं है ! अगर हम  हमारे देश का भगवान इन गरीबों को कहें तो गलत नहीं होगा ! ( भ्रष्टाचारियों के भगवान, नेताओं के भगवान )  !  हमारे देश में  जिंतनी संख्या गरीबों की हैं  उतनी जनसँख्या तो किसी छोटे मोटे राष्ट्र की भी नहीं होगी ! इस देश में  सब कुछ इन गरीबों की बजह से ही तो हो रहा है !  देश के बड़े बेईमान और भ्रष्टाचारी  नेता आज इन गरीबों का खून चूसकर ही तो देश में  राज कर रहे हैं ! देश में  जो भ्रष्टाचार चारों तरफ फैला हुआ है वो सब  इन गरीबों की वजह  से ही तो है ! अरे नहीं भई , इन गरीबों ने कोई भ्रष्टाचार नहीं फैलाया बल्कि इन गरीबों को मिलने वाली  आर्थिक सहायता को जब ऊंचे पदों पर बैठे  अधिकारी और मंत्री निगल गए तब से शुरू हो गया भ्रष्टाचार वर्ना भ्रष्टाचार , घूसखोरी आखिर किस चिड़िया का नाम था हम तो नहीं जानते थे ! सच तो ये है कि , हमारे देश के गरीब वाकई में  किसी " वीर योद्धा " से कम नहीं हैं  जो हर हाल में जी लेते हैं ,  चाहे कोई कितना भी जुल्म करे इन पर , फिर भी उफ़ तक नहीं करते और जीवन भर गरीब ही रहते हैं !  इन गरीबों का नाम लेकर आज देश में  ना जाने कितनी संस्थाएं काम कर रहीं हैं..... क्यों ? गरीबों का उत्थान करने के लिए  , फिर भले ही ये  संस्थाएं गरीबों के लिए कुछ ना करें पर अपना उत्थान ( उल्लू सीधा  ) जरूर कर रहीं हैं ! आज देश में  जितने भी नेता ऐशोआराम  की जिंदगी जी रहे है , और शान से देश की कमान संभाल रहे है वो भी  सिर्फ इन गरीबों की बदौलत ही संभव हुआ है ! ( देश का सबसे बड़ा वोट बैंक )  आज तक देश में  जितने भी घोटाले हुए हैं वो  सब इन गरीबों का हक मारकर ही तो हुए हैं ,  बेचारा गरीब तो अपनी गरीबी में  ही अपना पूरा जीवन गुजार देता है  और उस गरीब के नाम से इस देश में  अरबों-खरबों का लेनदेन बस यूँ ही हो जाता है ! अगर हमारे देश में  गरीब और गरीबी ना हो तो ना जाने कितने लोगों को तो भूखों मरने तक की नौबत आ जाए !  आज देश, नेताओं की बजह से नहीं बेचारे गरीबों की बजह से चल रहा है !( हमारा देश तो वश राम भरोसे चल रहा है  )  कितने ही घर परिवार आज इन गरीबों की बजह से चल रहे हैं ! देश में जो मंहगाई है वो हमारे लिए है क्योंकि मंहगाई से फर्क हम लोगों को पड़ता है किसी नेता और घूसखोर को नहीं ....... हमारे नाम पर तो हमारी सरकार " विश्व बैंक "  से करोड़ों रूपए ले आती है और दूसरी जगह हमारे मंत्रियों के करोड़ों के बिल बिना किसी पूंछ परख माफ़ हो जाते हैं ! अगर हम ना हों तो क्या होगा इस देश का ?  क्या ये वाकई में सच है कि " हमसे है जमाना - जमाने से हम नहीं "  तो फिर आज हम हैं कहाँ ......??????


धन्यवाद

Wednesday, June 20, 2012

हे " भारत माँ " ......>>> संजय कुमार

तेरे दिल में अभी और भी 
जख्मों की जगह है !
तेरा दिल जख्मी हुआ था 
जब मुंगलों ने तेरी छाती पर ,
पाँव जमाया था !
तेरा दिल जख्मी हुआ था 
जब अंग्रेजों ने तुझको 
बेड़ियों में जकड़ा था !
तेरा दिल जख्मी हुआ था 
जब तेरे जवान बेटे 
वीरगति को प्राप्त हुए थे !
पर शायद तब तुझे 
इस बात की ख़ुशी तो 
हुई होगी कि ,
तेरी आने वाली औलादें 
अब सुखी , सुरक्षित रहेंगी 
पर तेरा दिल 
और भी जख्मी हुआ  
यह देखकर 
कि , तेरी सोच के विपरीत 
तेरी औलादें ही 
आपस में एक-दुसरे को 
रुला रही हैं !
बेईमानी , स्वार्थ , यौन शोषण 
और भ्रष्टाचार के 
अवगुणों में पड़कर !
क्या तेरे दिल में  ?
अब भी , और जख्मों के लिए 
जगह है !
" भारत माँ "

( प्रिये पत्नी गार्गी की कलम से )

धन्यवाद  

Wednesday, June 13, 2012

पिता के दर्द को भी समझें .....>>> संजय कुमार

भारतीय  संस्कारों में  माता -पिता का स्थान ईश्वर से भी बढकर माना गया  है ! किसी भी इंसान की उत्पत्ति  माता-पिता के द्वारा ही होती    है , उन्हीं के कारण वो इस दुनिया को देख पाता  है , एक  कारण यह भी है कि,  एक बच्चा जन्म के बाद सबसे पहले अपने माता- पिता को ही जानता है इसलिए उसकी दुनिया इन्हीं से होती है , बाकि सब उसके बाद उसे बताया जाता है ! एक  माँ अपना सबसे ज्यादा समय अपने बच्चों के साथ गुजारती है , इसलिए सबसे ज्यादा प्यार वही करती है , और  पिता रहता है दिन भर बाहर वह भी सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए ! इसलिए कभी- कभी कुछ बच्चों को ये लगता है कि शायद पिता उनको उतना प्यार नहीं करते  जितना की उनकी  माँ उन्हें  करती है ! और कभी कभी यह बात बच्चों के मन में  घर कर जाती है ! पर एक पिता का फर्ज होता है ,कि वह अपने परिवार और बच्चों की  देखभाल करे ! जीवन की  हर सुख सुविधाओं और  जरूरतों को पूरा करे , और वह ऐसा ही करता है ,  अपना पूरा जीवन समर्पित करता है अपने परिवार और अपने बच्चों के लिए ! जीवन भर हर कष्ट सहते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह पूरी ईमानदारी के साथ करता है ! घर पर  बच्चों कि जिम्मेदारी माँ के हाँथ में  रहती है , और बाहर पिता की ,  जब बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय अपनी माँ के साथ  गुजारते हैं  , तो कई बार यह देखा गया है की  बच्चे माँ के लाडले हो जाते हैं  और उन्हें कई बार यह लगता है की उन्हें अब पिता के प्यार की जरूरत ही नहीं है  और वह इस गलत फहमी का शिकार हो जाते हैं कि, हमें तो हमारे पिता प्यार ही नहीं करते ,  और जब कभी बच्चों के सामने माँ के द्वारा पिता से यह बोला जाता है कि, तुम्हे तो बच्चों की  जरा भी फिक्र नहीं हैं , और न तुम्हें बच्चों से प्यार है !  इस तरह की  बातें जब बच्चे रोज - रोज सुनते हैं, तो एक गलत असर उनके दिमाग पर पड़ता है ! और धीरे एक विरोध की  भावना पिता के लिए उत्पन्न हो जाती है ! घर में  जब माँ हर बात में  बच्चे का पक्ष लेने लगे तो क्या होगा ? चाहे सही हो या गलत , अगर ऐसा है तो भविष्य में हमारे सामने कई समस्याएं उन्पन्न हो सकती हैं ! आज आधुनिकता इतनी बढ़ गयी है  कि व्यक्ति के पास तो वैसे  ही समय नहीं हैं अपने परिवार को समय देने का , उस पर हमारे बीच से  संस्कारों का धीरे-धीरे पतन होना !  आज कई परिवारों  में  यह देखने को मिल जाता है  कि , जिस पिता ने अपना खून-पसीना बहाकर जिन बच्चों को बड़ा किया, उन्हें समाज में  उठने बैठने लायक बनाया , जीवन की हर अच्छी और बुरी बात का ज्ञान कराया , उनको उनके पैरों पर खड़ा किया ,  आज वही बच्चे उन्हें  प्रतिदिन अपमान और तिरस्कार दे रहे हैं ! आज कई जगह यह भी देखने को मिल जाता है की , माँ  के अंधे लाड-प्यार की कीमत पिता को भुगतनी पड़ती है जो किसी भी पिता के दिल को सिर्फ आघात पहुंचाती है और एक ऐसी पीड़ा जो वो बयां नहीं कर पाता  !  एक  पिता जो बच्चों की बचपन से लेकर जवानी, शादी और शादी के बाद की सभी छोटी मोटी गलतियों को बिना किसी झिझक के माफ़ कर देता है , आज  वहीँ  जब कभी पिता द्वारा अगर कोई गलती हो जाये तो वही बच्चे जरा भी नहीं सोचते  अपने ही पिता का अपमान करने से ! एक पिता अपने बच्चों का जिन्दगी भर सिर्फ भला सोचता है  पर आज के इस कलियुग में " राम "  अब कहीं दिखाई नहीं देते पर "  दशरथ " आज भी बहुत हैं जो सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चों से प्यार करते हैं , और उनकी जरा सी तकलीफ में  अपना सब कुछ न्योछावर  करने को तत्पर तैयार  रहते हैं किन्तु  आज  उनकी संतान नहीं !  आखिर एक पिता अपने बच्चों से क्या चाहता है  ?  थोडा सा प्यार , पिता का मान-सम्मान और कुछ नहीं !जिस तरह माँ की ममता महान होती है , उसी तरह पिता का प्यार भी महान होता है ! 
एक गुजारिश :  ना करें अपने पिता का अपमान , भला हो या बुरा , पिता तो पिता ही होता है , उसका दर्द भी समझें ..................................।


धन्यवाद  

Tuesday, June 5, 2012

पर्यावरण दिवस पर , आप सभी से विनम्र निवेदन ......... >>>> संजय कुमार

आज पूरा विश्व जिस महाप्रलय से डर रहा है , उसका जिम्मेदार  कोई और नहीं हम मानव ही हैं ! आज हम लोगों ने ही इस महाप्रलय को स्वयं निमंत्रण दिया है ! पिछले बर्ष  जो जापान के साथ हुआ था  , वो महाप्रलय हम सभी ने अपनी आँखों से देखा है ! क्या हमने  उससे कुछ सबक लिया  ?  प्रक्रति के इस महाप्रलय से , क्या हमने कुछ सीखा ?  शायद नहीं ! क्या आप जानते हैं ? इस महाप्रलय का कारण क्या है ? शायद आप जानते हैं ,  इसका कारण,  क्योंकि कारण हम स्वयं ही हैं ! जब कारण हम ही हैं तो प्रक्रति को दोष देने से क्या होगा  ! आज हमने अपने आपको इतना व्यस्त कर लिया है कि, हम अपने बारे में सोचने के अलावा शायद  कुछ और नहीं कर पाते , ( मंहगाई , भ्रष्टाचार , घोटाले , संसद , सरकार  , लोकपाल , अन्ना-रामदेव इसके अलावा कुछ भी नहीं )  यदि हम कभी भी प्रकृति के बारे में सोचते या उसको बचाने के लिए कुछ करते तो शायद इस तरह के महाप्रलय से बच जाते  !  प्राक्रतिक महाप्रलय की जिम्मेदार प्रक्रति नहीं हम इंसान हैं ! आज हम लोग जिस तरह प्रक्रति से छेड़छाड़ कर रहे हैं ! या यूँ कहें उसके साथ बलात्कार कर रहे हैं , हम उसको जिस  तरह से तहस-नहस और नेस्तनाबूत कर रहे हैं ! प्रकृति का जब इस तरह दोहन होता रहेगा तो प्रकृति का बदला लेना जायज है !  प्रक्रति समय समय पर  हम सबको चेतावनी जरुर देती और आगाह करती है कि , वक़्त रहते संभल जाइये वर्ना ...........  उसकी चेतावनी अगर जापान में आये प्रलय जैसी है तो अंदाजा लगाइए  उसका प्रकोप कितना भयंकर होगा !  उसके ख्याल से ही इंसानी रूह काँप जाती है !  देश को आधुनिक बनाने के चक्कर में जिस तरह हमने बड़े - बड़े जंगलों का सफाया किया है , उसी का नतीजा है ये सब , वृक्षारोपण के नाम पर होता भ्रष्टाचार भी इसकी एक बड़ी बजह है ! सड़क निर्माण और हजारों किलोमीटर लम्बे हाइवे बनाने में जिस  तरह लाखों-करोड़ों पेड़ों को काट दिया जाता है, या उनको काट दिया गया है , उनकी भरपाई हम आज तक नहीं कर पाए और शायद कभी कर भी नहीं पायेंगे ! हम सब अच्छी सड़क मार्गों का आनंद लेते हैं वो भी प्रक्रति का दोहन करते हुए ! बड़े - बड़े खेत -खलिहानों और बड़े - बड़े पेड़ों को साफ़ कर भू-माफिया अपनी जेबें भर रहे हैं ! बड़े -बड़े प्राक्रतिक मैदानों को समतल कर शोपिंग माल बनाये जा रहे हैं ! हमारे देश में वृक्षारोपण की कई मुहीम चलायी जाती हैं ! लेकिन हम कितने सफल होते हैं वृक्षारोपण जैसी मुहीम में !  आज जहाँ हर दिन हर पल भ्रष्टाचार हो रहा है !  वहां प्रक्रति के साथ भी हम धोखा कर रहे हैं !  हम लोगों ने हजारों - लाखों पेड़ लगाए तो हैं लेकिन कहाँ ? आप तो जानते ही होंगे सिर्फ कागजों में , हम भले ही पेड़ कागजों में लगायें , लेकिन प्रक्रति अपना हिसाब सबके समक्ष ही लेगी ! यदि हमारे पास प्राकृतिक संपदा नहीं  हैं तो  क्या होगा इस ब्रह्माण्ड का ?  कुछ नहीं वचेगा इस प्रथ्वी पर हर जगह सिर्फ तवाही और तवाही !  इसलिए हमें रोकना होगा इस तरह के महाप्रलय को ! पर्यावरण और प्रकृति इस ब्रह्माण्ड की सबसे कीमती धरोहर !  हम आधुनिक तौर पर तो सुन्दर हो गए किन्तु प्राकर्तिक सुन्दरता दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है ! प्रकृति ने  इस कायनात को अपना सर्वश्व दिया है ! और हम कुछ भी नहीं दे पाए ! इस प्रकृति ने  इंसानों को इनको इतने उपहार दिए हैं , जिसका ऋण ये मानव कभी नहीं उतार सकता ! 
आप सभी से मेरा विनम्र निवेदन है ........ अभी भी वक़्त है ...... रूठी हुई प्रकृति को मनाने का ....... तो मना लीजिये .. अब देर ना कीजिये 
ये प्रकृति और पर्यावरण आपके हैं ..... अपनों का ख्याल रखिये ...................

धन्यवाद